बच्चे की परवरिश में प्यार के साथ जरूरी है सही अनुशासन, इन बातों से बनाएं मजबूत रिश्ता
By: Team Aapkisaheli | Posted: 03 Sep, 2026
बच्चों की परवरिश केवल उनकी जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनके व्यक्तित्व को सही दिशा देने की जिम्मेदारी भी माता-पिता की होती है। बचपन में मिली छोटी-छोटी सीख आगे चलकर बच्चे की सोच, व्यवहार और फैसले लेने के तरीके को प्रभावित करती है। कई बार माता-पिता बच्चों को खुश रखने के लिए उनकी हर बात मान लेते हैं, तो कभी छोटी गलती पर जरूरत से ज्यादा सख्ती करने लगते हैं। दोनों ही स्थितियां बच्चे के लिए सही नहीं होतीं। अच्छी परवरिश में प्यार, भरोसा, समझ और अनुशासन के बीच संतुलन होना जरूरी है। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि माता-पिता उसकी बात सुनते हैं, उसकी भावनाओं को समझते हैं और गलती होने पर उसे सुधारने का मौका भी देते हैं। सही तरीका अपनाकर माता-पिता बच्चे को आत्मविश्वासी और जिम्मेदार बना सकते हैं।
बच्चे की बात सुनना बनाएं अपनी आदतबच्चा जब अपनी कोई बात बताना चाहता है, तो उसे बीच में रोकने या तुरंत सलाह देने के बजाय पहले ध्यान से सुनें। उसकी छोटी लगने वाली परेशानी भी उसके लिए बड़ी हो सकती है। जब माता-पिता बच्चे की बात को महत्व देते हैं, तो उसके अंदर अपनी भावनाएं खुलकर बताने का भरोसा पैदा होता है। इससे माता-पिता और बच्चे के बीच ऐसा रिश्ता बनता है, जिसमें बच्चा परेशानी होने पर बात छिपाने के बजाय परिवार से साझा करना पसंद करता है।
हर गलती पर डांटने के बजाय समझाएंबच्चों से गलतियां होना स्वाभाविक है। पढ़ाई में गलती हो, कोई सामान टूट जाए या बच्चा किसी बात पर गलत व्यवहार कर बैठे, तो तुरंत डांटने के बजाय उसे समझाने की कोशिश करें। बच्चे को बताएं कि उसकी गलती क्या थी और अगली बार वह उसे कैसे सुधार सकता है। बार-बार डांटने से बच्चा डर सकता है, जबकि प्यार से समझाने पर वह अपनी गलती से सीखना शुरू करता है। अनुशासन जरूरी है, लेकिन उसमें डर से ज्यादा समझ का होना जरूरी है।
बच्चे को छोटी जिम्मेदारियां जरूर देंउम्र के अनुसार बच्चों को घर के छोटे कामों की जिम्मेदारी देना उनकी सोच को मजबूत बनाता है। खिलौने अपनी जगह रखना, किताबें संभालना, खाने के बाद अपनी प्लेट सही जगह रखना जैसे काम बच्चे को जिम्मेदारी का अर्थ समझाते हैं। हर काम माता-पिता खुद करने के बजाय बच्चे को भी प्रयास करने का मौका दें। शुरुआत में उससे गलती हो सकती है, लेकिन धीरे-धीरे उसमें अपने काम को पूरा करने की आदत विकसित होगी और उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
तुलना से बचें और बच्चे की खूबियां पहचानेंहर बच्चा अलग होता है। किसी बच्चे की पढ़ाई अच्छी हो सकती है, तो कोई खेल, चित्र बनाने, बोलने या किसी दूसरे काम में बेहतर हो सकता है। इसलिए उसकी तुलना भाई-बहन या दूसरे बच्चों से करने से बचें। तुलना बच्चे के मन में हीन भावना पैदा कर सकती है। इसके बजाय उसकी रुचि और क्षमता को पहचानें और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। जब बच्चे को लगेगा कि माता-पिता उसकी खूबियों को समझते हैं, तो वह अपनी क्षमता पर ज्यादा भरोसा करेगा।
प्यार जताएं, लेकिन हर जिद पूरी न करेंबच्चे को प्यार देना जरूरी है, लेकिन प्यार का मतलब उसकी हर मांग पूरी करना नहीं है। अगर किसी बात पर माता-पिता को लगता है कि बच्चे के लिए वह सही नहीं है, तो प्यार से मना करना भी जरूरी है। बच्चे को धीरे-धीरे समझाएं कि हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं हो सकती। इससे उसमें धैर्य और समझ विकसित होगी। प्यार और अनुशासन का यही संतुलन बच्चे को भावनात्मक रूप से मजबूत और जिम्मेदार बनाने में मदद करता है।
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