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रात को रट्टा सुबह सन्नाटा - क्यों सोते ही डिलीट हो जाती है बच्चों की मेमोरी, जानें इसके पीछे का दिमागी खेल

By: Team Aapkisaheli | Posted: 17 July, 2026

रात को रट्टा सुबह सन्नाटा - क्यों सोते ही डिलीट हो जाती है बच्चों की मेमोरी, जानें इसके पीछे का दिमागी खेल
​क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि रात को बच्चे को जो स्पेलिंग या टेबल उंगलियों पर याद थी सुबह उठते ही वह उसके दिमाग से छू-मंतर हो जाती है। अक्सर माता-पिता को लगता है कि बच्चा ध्यान नहीं दे रहा या नाटक कर रहा है। लेकिन ठहरिए। इसके पीछे बच्चे की कोई बदमाशी नहीं बल्कि उनके दिमाग का एक बेहद दिलचस्प न्यूरोलॉजिकल मैकेनिज्म काम कर रहा होता है। ​आइए जानते हैं कि सोते ही बच्चों के दिमाग का सॉफ्टवेयर कैसे काम करता है और इस भूलने की बीमारी को हम कैसे सुपर मेमोरी में बदल सकते हैं।

​मेमोरी सिंक का खेल और रात को ऐसा क्या होता है
​वैज्ञानिकों के अनुसार इंसानी दिमाग में एक हिस्सा होता है जिसे हिप्पोकैम्पस कहते हैं। यह हमारे दिमाग का टेम्परेरी स्टोरेज यानी रैम की तरह होता है। बच्चों में यह हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं होता है।
​पहला कारण है मेमोरी कंसोलिडेशन। जब हम सोते हैं तो हमारा दिमाग शॉर्ट-टर्म मेमोरी को लॉन्ग-टर्म मेमोरी यानी हार्ड ड्राइव में ट्रांसफर करता है। इस प्रोसेस को मेमोरी कंसोलिडेशन कहते हैं।
​दूसरा कारण है अधूरी नींद यानी डेटा करप्शन। अगर बच्चा देर से सोता है या उसकी नींद गहरी नहीं होती तो यह ट्रांसफर प्रोसेस बीच में ही टूट जाता है। नतीजा यह होता है कि सुबह उठते ही रात का याद किया हुआ हिस्सा गायब हो जाता है।

​इन तीन विलेन्स से बचाएं बच्चों की मेमोरी
​केवल नींद ही नहीं, हमारी कुछ अनजानी आदतें भी बच्चों की याददाश्त की दुश्मन बन रही हैं।
​पहला विलेन है स्क्रीन टाइम का ओवरडोज यानी पढ़ाई के तुरंत बाद फोन देखना। पढ़ाई पूरी करते ही बच्चे के हाथ में मोबाइल या टीवी का रिमोट थमा देना सबसे बड़ी भूल है। इसे साइंस में अट्रैक्टिव डिस्ट्रैक्शन कहते हैं। पढ़ाई के तुरंत बाद डिजिटल स्क्रीन देखने से दिमाग नई और चमकती हुई जानकारियों में उलझ जाता है, जिससे पढ़ाई का डेटा सेव होने से पहले ही डिलीट हो जाता है।

​दूसरा विलेन है कोर्टिसोल का बढ़ता स्तर यानी तनाव और डर। सुबह टेस्ट है और पूरे नंबर नहीं आए तो देखना। माता-पिता का यह डर बच्चे के दिमाग में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन को बढ़ा देता है। कोर्टिसोल दिमाग के सोचने और याद रखने वाले हिस्से को ब्लॉक कर देता है। तनाव में याद की गई चीजें सुबह तक धुंधली हो जाती हैं।
​तीसरा विलेन है रटने की आदत। बिना समझे केवल शब्दों को रट लेने से वह जानकारी दिमाग के केवल बाहरी हिस्से में तैरती रहती है। जैसे ही बच्चा सोता है दिमाग उसे बेकार कचरा समझकर साफ कर देता है।

​बच्चों को मेमोरी किंग बनाने के चार आसान सीक्रेट्स
​अगर आप चाहते हैं कि बच्चे को पढ़ाया हुआ हमेशा याद रहे तो इन वैज्ञानिक तरीकों को आजमाएं।
​मेमोरी बूस्टर फॉर्मूला यह है कि एक्टिव रिकॉल स्पेस रिपेटिशन और नौ घंटे की नींद मिलकर याददाश्त को मजबूत बनाते हैं।

​पहला तरीका है एक्टिव रिकॉल तकनीक। बच्चे से कहें कि जो उसने पढ़ा है वह आपको एक कहानी की तरह समझाए। जब बच्चा खुद शिक्षक बनकर पढ़ाता है तो जानकारी सीधे लॉन्ग-टर्म मेमोरी में जाती है।

​दूसरा तरीका है बीस मिनट का नो-स्क्रीन बफर टाइम। पढ़ाई खत्म होने और सोने के बीच कम से कम बीस से तीस मिनट का गैप रखें। इस दौरान बच्चे को कोई भी डिजिटल स्क्रीन न देखने दें। उन्हें थोड़ा टहलने या हल्की बातें करने दें ताकि दिमाग को डेटा प्रोसेस करने का समय मिले।

​तीसरा तरीका है नौ घंटे की गहरी नींद। छह से बारह साल के बच्चों के लिए नौ से दस घंटे की गहरी नींद बेहद जरूरी है। नींद जितनी गहरी होगी याददाश्त उतनी ही पक्की होगी।
​चौथा तरीका है विजुअल लर्निंग। चीजों को तस्वीरों चार्ट या मजेदार उदाहरणों से जोड़कर सिखाएं। हमारा दिमाग शब्दों के मुकाबले तस्वीरों को साठ हजार गुना तेजी से प्रोसेस करता है।

​पैरेंट्स के लिए काम की बात
​सुबह बच्चे का भूल जाना कोई बीमारी नहीं बल्कि दिमाग के बढ़ने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। उन्हें डांटने या सजा देने के बजाय उनके सीखने के माहौल को तनावमुक्त बनाएं। लेकिन हां अगर बच्चा रोजमर्रा की बेहद सामान्य बातें जैसे अपना नाम रास्ता या अपनों के चेहरे भूलने लगे तो किसी बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
हेमलता शर्मा जयपुर

#उफ्फ्फ! ऐश ये दिलकश अदाएं...


Cramming at night, a blank slate by morning,why does children,s memory get wiped clean as soon as they sleep!, memory , sleep, morning

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