डिजिटल युग में दरकते रिश्तों की दीवार और परवरिश की नई चुनौतियां
By: Team Aapkisaheli | Posted: 05 Apr, 2026
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तकनीक के मायाजाल ने हमारे पारिवारिक ढांचे को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां संवाद की जगह साइलेंस ने ले ली है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने जहां दुनिया को करीब लाया है वहीं एक ही छत के नीचे रहने वाले माता पिता और बच्चों के बीच की दूरियां बढ़ा दी हैं। आजकल हर घर में जेनरेशन गैप अब डिजिटल गैप में बदलता जा रहा है जिससे आपसी तालमेल और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।
स्क्रीन की लत क्या हम अपनी एकाग्रता खो रहे हैंः अक्सर देखा जाता है कि बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी अब हर काम मोबाइल के साथ करना पसंद करते हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक और यहां तक कि भोजन या निजी समय के दौरान भी फोन हाथ से नहीं छूटता।
विशेषज्ञों का कहना है कि बाथरूम जैसी जगहों पर मोबाइल ले जाना केवल एक आदत नहीं बल्कि नोमोफोबिया फोन खोने या दूर होने का डर का संकेत हो सकता है। यह लत बच्चों की सोचने की क्षमता और उनकी गहरी एकाग्रता को प्रभावित कर रही है क्योंकि उनका मस्तिष्क लगातार सूचनाओं के बोझ तले दबा रहता है।
सुरक्षा या जासूसी कहां खत्म होती है माता-पिता की चिंताः दूसरी ओर माता-पिता की बढ़ती चिंता भी एक गंभीर विषय है। आज के असुरक्षित माहौल में अभिभावक अपने बच्चों की पल पल की खबर रखना चाहते हैं। लेकिन जब यह चिंता ओवर पैरेंटिंग या जासूसी का रूप ले लेती है तो बच्चे इसे अपनी निजता पर हमला मानने लगते हैं। 15 से 18 साल की उम्र के किशोरों में यह भावना सबसे ज्यादा प्रबल होती है। उन्हें लगता है कि उनके माता पिता उन पर भरोसा नहीं करते जिससे वे बातें छुपाने लगते हैं और झूठ का सहारा लेने लगते हैं।
गैजेट्स से हटकर कैसे लाएं रिश्तों में गरमाहटः मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस समस्या का समाधान किसी भी प्रकार के प्रतिबंध में नहीं बल्कि डिजिटल साक्षरता और खुले संवाद में छिपा है। इसके लिए कुछ प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।
पारिवारिक नियम और मर्यादाएंः घर में कुछ ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए जो सभी पर समान रूप से लागू हों। जैसे डाइनिंग टेबल पर कोई फोन नहीं होगा या रात 10 बजे के बाद सभी के फोन एक निश्चित स्थान पर रख दिए जाएंगे।
क्वालिटी टाइम की परिभाषाः केवल एक साथ बैठना काफी नहीं है। परिवार को साथ मिलकर खेल खेलने सैर पर जाने या बिना किसी तकनीक के पुरानी यादें साझा करने की जरूरत है।
विश्वास का माहौलः माता पिता को बच्चों को यह यकीन दिलाना होगा कि उनका पूछना नियंत्रण के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए है। वहीं बच्चों को भी अपनी जिम्मेदारियों को समझकर माता पिता का भरोसा जीतना होगा।
तकनीक बुराई नहीं है लेकिन इसका अनियंत्रित उपयोग हमारे रिश्तों की जड़ों को खोखला कर रहा है। समय रहते अगर हमने मोबाइल की वर्चुअल दुनिया से निकलकर अपनों की वास्तविक दुनिया में निवेश नहीं किया तो भविष्य में परिवार केवल एक औपचारिक संस्था बनकर रह जाएंगे। रिश्तों में संतुलन और विश्वास ही वह चाबी है जो इस डिजिटल उलझन को सुलझा सकती है।
- हेमलता शर्मा, जयपुर
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