बच्चों के साथ जरूरी है पेरेंट्स का ऐसा व्यवहार, रिलेटिव्स करेंगे तारीफ
By: Team Aapkisaheli | Posted: 17 Aug, 2026
बच्चे की परवरिश सिर्फ उसकी जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके व्यक्तित्व, सोच और व्यवहार को आकार देने की भी जिम्मेदारी होती है। बच्चे अपने आसपास के माहौल से बहुत कुछ सीखते हैं और माता-पिता का व्यवहार उनके लिए सबसे बड़ा उदाहरण बनता है। ऐसे में अच्छी पैरेंटिंग का मतलब हर समय बच्चे को रोकना-टोकना या उसकी हर इच्छा पूरी करना नहीं है। जरूरी है कि बच्चे को प्यार के साथ सही और गलत के बीच अंतर समझाया जाए और उसकी बात को भी महत्व दिया जाए। कई बार माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चे के लिए फैसले लेने लगते हैं, लेकिन उम्र के साथ बच्चे को अपनी बात रखने और छोटे फैसले लेने का अवसर देना भी जरूरी है।
बच्चे की बात ध्यान से सुनेंअच्छी पैरेंटिंग की शुरुआत बच्चे को सुनने से होती है। जब बच्चा स्कूल, दोस्तों या अपनी किसी परेशानी के बारे में बात करे, तो तुरंत उसकी बात को छोटा या गलत न बताएं। कई बार बच्चों के लिए छोटी लगने वाली बात उनके लिए बहुत बड़ी हो सकती है। उनकी बात ध्यान से सुनने से उन्हें महसूस होता है कि माता-पिता उनकी भावनाओं को समझते हैं। अगर आप किसी बात से सहमत नहीं हैं, तो भी शांत तरीके से अपना पक्ष समझाएं। इससे बच्चे के मन में माता-पिता के प्रति भरोसा मजबूत होता है और वह भविष्य में अपनी परेशानियां साझा करने में ज्यादा सहज महसूस कर सकता है।
हर गलती पर डांटने के बजाय समझाएंबच्चों से गलतियां होना स्वाभाविक है। अगर हर गलती पर डांट या सजा मिलेगी, तो बच्चा अपनी गलती छिपाना सीख सकता है। इसके बजाय पहले समझें कि गलती क्यों हुई और फिर उसे सही तरीका बताएं। उदाहरण के लिए अगर बच्चा कोई सामान तोड़ देता है, तो केवल गुस्सा करने के बजाय उसे सावधानी से चीजें इस्तेमाल करने का तरीका समझाया जा सकता है। इससे बच्चा डर के कारण नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझकर व्यवहार करना सीखता है।
बच्चों को छोटे फैसले खुद लेने देंउम्र के अनुसार बच्चों को छोटे-छोटे फैसले लेने का मौका देना उनके आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है। जैसे कपड़ों का रंग चुनना, किताब या खेल चुनना अथवा अपनी पढ़ाई का छोटा शेड्यूल बनाना। हर निर्णय माता-पिता खुद लेने के बजाय बच्चे को विकल्प देकर उसकी पसंद पूछें। अगर उसका चुनाव सुरक्षित और उचित है, तो उसे आजमाने दें। इससे बच्चे में जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है और वह अपने फैसलों के परिणाम समझना सीखता है।
दूसरे बच्चों से तुलना करने से बचें‘देखो, तुम्हारा दोस्त कितना अच्छा करता है’ जैसी बातें बच्चे के आत्मविश्वास पर असर डाल सकती हैं। हर बच्चे की क्षमता, रुचि और सीखने की गति अलग होती है। इसलिए उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करने के बजाय उसके अपने पिछले प्रदर्शन पर ध्यान दें। अगर बच्चे ने पहले से थोड़ा बेहतर किया है, तो उसकी मेहनत की तारीफ करें। इससे उसे लगातार बेहतर करने की प्रेरणा मिल सकती है। तारीफ करते समय केवल परिणाम के बजाय उसकी मेहनत, धैर्य और कोशिश को महत्व देना ज्यादा उपयोगी है।
माता-पिता खुद बनें बच्चे के रोल मॉडलबच्चे केवल कही गई बातें नहीं सीखते, बल्कि माता-पिता को देखकर भी व्यवहार अपनाते हैं। अगर आप चाहते हैं कि बच्चा दूसरों से सम्मान से बात करे, तो घर में आप भी सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करें। आप चाहते हैं कि बच्चा मोबाइल कम इस्तेमाल करे, तो खुद भी उसके सामने फोन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें। घर का माहौल बच्चे के व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए प्यार, अनुशासन, बातचीत और अच्छे उदाहरण का संतुलन बनाकर चलना ही बेहतर पैरेंटिंग की मजबूत नींव हो सकती है।
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