Parenting: डिजिटल नशा रोते बच्चों को स्मार्टफोन की घूस देने वाले माता-पिता सावधान
By: Team Aapkisaheli | Posted: 20 Jun, 2026
स्मार्टफोन आज के दौर में बच्चों का नया खिलौना नहीं बल्कि एक डिजिटल झुनझुना बन चुका है। आजकल के पेरेंट्स के लिए रोते हुए बच्चे को चुप कराने या उसे खाना खिलाने का सबसे आसान तरीका यही है कि उसके हाथ में चमकती हुई मोबाइल स्क्रीन थमा दी जाए।
पहली नजर में यह एक समझदारी भरा और सुकून देने वाला शॉर्टकट लगता है। लेकिन स्वास्थ्य जगत के विशेषज्ञ इसे स्क्रीन ब्राइबिंग यानी स्क्रीन की रिश्वत देना कह रहे हैं। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि बच्चों को शांत रखने की यह खामोशी असल में एक बड़े तूफान की आहट है।
क्या है यह डिजिटल घूस का खेल: घर हो कोई महफिल हो या फिर सफर जैसे ही बच्चा जिद पर अड़ता है माता-पिता बिना वक्त गंवाए अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर उसे थमा देते हैं। बच्चा तुरंत स्क्रीन की दुनिया में खो जाता है और माता-पिता को कुछ पल का सुकून मिल जाता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे एक लत में बदल जाती है। पेरेंट्स जाने-अनजाने में बच्चे की हर जिद का हल सिर्फ तकनीक को बना देते हैं जिससे बच्चा असल दुनिया और इंसानी भावनाओं से दूर होने लगता है।
बच्चों के भविष्य पर मंडराता खतरा: डॉक्टरों के अनुसार मोबाइल और टैबलेट की यह लत बच्चों के कोमल दिमाग और उनके व्यवहार को पूरी तरह बदल रही है। इसके कुछ बेहद गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं:-
पेरेंट्स को यह समझना होगा कि शुरुआती सालों में बच्चों का दिमाग बहुत तेजी से विकसित होता है।
जब वे स्क्रीन में खोए रहते हैं तो उनका मानसिक और सामाजिक विकास पूरी तरह रुक जाता है। स्क्रीन पर लगातार रील्स और वीडियो देखने की वजह से बच्चों में एकाग्रता की भारी कमी देखी जा रही है। वे किसी भी एक चीज या पढ़ाई पर ज्यादा देर ध्यान नहीं लगा पाते और उनका दिमाग तुरंत भटक जाता है।
गैजेट्स की दुनिया में डूबे रहने वाले बच्चों में बातचीत करने और अपनी भावनाएं जताने की क्षमता कम हो रही है। डॉक्टरों के पास ऐसे कई मामले आ रहे हैं जहां बच्चे सामान्य उम्र बीत जाने के बाद भी ठीक से बोल नहीं पा रहे हैं।
देर रात तक मोबाइल देखने या स्क्रीन के सामने रहने से बच्चों की जैविक घड़ी बिगड़ जाती है।
स्क्रीन की रोशनी उनके दिमाग को सोने का संकेत नहीं देती जिससे वे अनिद्रा और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो रहे हैं। इस लत से बाहर निकलने का रास्ता:
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान किसी दवा में नहीं बल्कि माता-पिता के व्यवहार में है।
बच्चों को इस डिजिटल चक्रव्यूह से निकालने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे:
बच्चों को डिजिटल घूस देने के बजाय उनके साथ समय बिताना शुरू करें। जब बच्चा रोए या जिद करे तो उसे गैजेट देने के बजाय उससे बात करें।उसे पार्क ले जाएं या मिट्टी और खिलौनों से खेलने के लिए प्रेरित करें। बच्चों के सामने खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल कम करें क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। उनके रोने और चिड़चिड़े होने पर थोड़ा धैर्य रखें और हर बार शॉर्टकट अपनाने से बचें।
-हेमलता शर्मा, जयपुर
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