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चेहरा है आपके जीवन का दर्पण

By: Team Aapkisaheli | Posted: 10 Sep, 2012

चेहरा है आपके जीवन का दर्पण
अमूमन कहा जाता है, चेहरे में क्या रखा है, देखना है तो व्यक्ति के गुण और कमों को देखो। यह सच्चााई भी है। मगर जीवन के समग्र गुण-कर्म-धर्म आपके चेहरे में झलकते हैं। खास हम यह पढ पाएं। इसमें महारत हासिल की थी ऋषिपाराशर ने, और इस पर लिख डाला महान ग्रंथ- बृहद् पाराशर होरा शास्त्र। दरअसल मानव शरीर पंचतत्वों का बना है और जब मिट्टी में मिलता है तो भी यह पंचतत्व में ही समा जाता है। पाराशर ऋषि इन पंचतत्वों को व्यक्ति के चेहरे में खोजने की क्षमता रखते थे और उन्होंने अपने ग्रंथ बृहद पाराशर होरा शास्त्र में इस बात का उल्लेख बखूबी किया है। न केवल जो ग्रह बली है उसकी दशा-अंतर्दशा में बल्कि प्रत्येक ग्रह की दशा-अंतर्दशा में उससे संबंधित तत्व व्यक्ति के चेहरे पर दिखाई देने लगता है और व्यवहार में भी उस तत्व का आधिक्य दिखाई पडने लगता है। व्यक्ति की जन्मपत्रिका यदि ना भी हो तो उसका चेहरा चलने वाली दशा का बयान करने में सफल हो जाता है। इसीलिए शायद चेहरे को व्यक्तित्व का दर्पण कहा जाता है। जिन पंचतत्वों की बात मैंने ऊपर की है उनमें अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल और वायु का उल्लेख है और जिनके स्वामी क्रमश: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि माने गए हैं। इन ग्रहों से संबंधित तत्व का आधिक्य व्यक्ति के चेहरे पर दिखाई देने लगता है। यदि मंगल बली हों तो अग्नि प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है और उसमें अग्नि तत्व का प्राचुर्य होता है। यदि जन्मकाल में बुध बलवान हों तो व्यक्ति भूमि के स्वभाव का होता है। यदि बृहस्पति बलवान हो तो जातक आकाश स्वभाव का होता है। यदि शुक्र बलवान हों तो जातक जल स्वभाव का होता है। यदि शनि बलवान हों तो वात प्रभाव का होता है। यदि एक से अधिक ग्रह बलवान हों तो जातक मिश्र प्रकृति का होता है और उसमें विभिन्न प्रवृत्तियां समय-समय पर विरोधाभासी फल भी देती पाई जाती हैं। सूर्य प्रबल हो तो अग्नि तत्व अधिक होता है।
चंद्रमा प्रबल हो तो जल तत्व अधिक होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो पाराशर ने बताई वह यह कि जिस ग्रह की महादशा होती है उस काल में उस दशा से संबंधित पंच महाभूतों में से तत्संबंधित महाभूत अपनी छाया (शरीर कांति) को प्रकट करते हैं। अग्नि तत्व से पीя┐╜डत व्यक्ति अपनी दशा में क्षुधा से पीя┐╜डत, चंचल, वीर, कृशकाय, विद्वान, बहुत भोजन करने वाला, तीक्ष्ण, गौरवर्ण और अभिमानी होता है। पृथ्वी तत्व वाला व्यक्ति कपूर और कमल की भांति सुगंध वाला होता है। ऎसा व्यक्ति भोगी, स्थिर सुख वाला, बलवान, क्षमावान, सिंह के समान गरजने वाला और गंभीर प्रकृति वाला होता है। आकाश तत्व जिस व्यक्ति में अधिक हो वह शब्दार्थ को जानने वाला, नीति निपुण, प्रगल्भ, ज्ञानयुक्त, अनावृत्त मुख वाला और अच्छे कद वाला होता है। जल तत्व के आधिक्य वाला व्यक्ति कांतिवान, भार सहन करने वाला, मृदुभाषी, भूमिपति, बहुत से मित्रों वाला अर्थात् लोकप्रिय और विद्वान होता है जिस मनुष्य में वायु तत्व की अधिकता मिले वह दानी, क्रोधी, गौरवर्ण, पर्यटन प्रिय, भूमिपति, शत्रुजित और कृशकाय होता है।
जब अग्नि तत्व का उदय होता है। शरीर में स्वर्ण के समान कांति, दृष्टि में प्रसन्नता, सर्वत्र सफलता, शत्रुओं पर विजय और धन का लाभ होता है। जब भूमि तत्व का उदय होता है (अर्थात बुध महादशा के समय) तो शरीर में भांति-भांति की सुगंध तथा नख, केश, दांत, सब स्वच्छ होते हैं एवं धर्म, धन एवं सुख की प्राप्ति होती है और महादशा पर्यन्त ऎसा ही वातावरण रहता है। जब आकाश तत्व का उदय होता है और आकाश तत्व के स्वामी बृहस्पति की दशा होती है तो मनुष्य शब्दार्थ को समझने के कारण वाक् पटुता या अन्य कारणों से अपने प्रभाव को बढ़ाने मे सफल होता है। ऎसे समय में शब्द के उच्चारण से प्रभावित करता है और शब्द का श्रवण करने से लाभ होता है। इस तथ्य में निहितार्थ यह है कि साधु-संतों का साथ तथा उच्चाकोटि के विद्वानों की संगत मिलती है। जल तत्व का उदय होने पर तथा चंद्रमा या शुक्र की महादशाओं मे शरीर की कोमलता, स्वास्थ्य और सुस्वादु भोजन का सुख मिलता है, जबकि वायु तत्व का उदय होने पर अर्थात् शनि की प्रबलता होने पर शरीर में मलीनता, मूढ़ता, दारिद्रय, वातरोग, शोक और संताप होता है। पाराशर मुनि ने कहा है कि ये फल तभी मिलेंगे जब पंच महाभूतों के स्वामी अपनी छाया या कांति के उदय के समय में बलवान हों। यदि निर्बल हो तो फल उच्चकोटि के नहीं मिलेंगे बल्कि कम मिलेंगे। यदि ग्रह नीच, शत्रुगत या दु:स्थानों में हों तो फलों की प्रकृति बदल जाएगी और विपरीत फल मिलेंगे।
बलहीन ग्रहो के फल स्वप्न या कल्पना में प्राप्त होते हैं। जिसके जन्म के समय का ज्ञान न हो तो जिस भांति का फल चल रहा है उसी पंचभूत के स्वामी ग्रह की दशा समझनी चाहिए और ऎसा अनुमान लगाना चाहिए और तदनुसार ही दान, जप या अन्य निवृत्ति उपाय किए जाने चाहिएं। उपरोक्त विवरण पंचमहाभूत फलाध्याय से लिए गए हैं। कुछ श्लोकों का विवरण देकर महर्षि पाराशर ने बहुत कुछ कह दिया है। हमें तार्किक दृष्टि से इन सब बातों का विश्लेषण इस भांति करना चाहिए कि यथार्थ फलित ज्योतिष में उसकी उपयोगिता का हमें ज्ञान हो सके। उपरोक्त विवरण से दो अर्थ निकलते हैं कि प्रत्येक महादशा काल में जातक का जो स्वभाव परिलक्षित होता है वह महादशा बदलते ही बदल जाएगा। लगभग सभी ग्रह दशाक्रम के अनुसार विभिन्न प्रकृति के होते हैं। जैसे सूर्य अग्नि तत्व हुए तो जो तूफान सूर्य की महादशा में आएगा चंद्रमा की दशा में जल के समान शांति हो जाएगी। चंद्रमा की दशा में शांतिकाल के कारण जो शक्ति संचय होगा उसका प्रकटन फिर मंगल महादशा में होगा। मंगल पुन: अग्नि तत्व हैं।
राहु और केतु का विवरण इस अध्याय में पाराशर जी ने नहीं दिया है। इन ग्रहों के बारे में जो मेरा चिंतन है वह मैं किसी स्वतंत्र लेख में प्रकट करूंगी। बुध की महादशा पृथ्वी तत्व की महादशा होती है। इसमें भूमि, धन एवं स्त्री सुख प्राप्त होता है। किसी भी अवस्था में बुध, चाहे किसी भी भाव के स्वामी हो स्त्री-पुरूष संबंध बनते-बिग़डते मैंने देखे हैं। पुन: पाराशर मुनि कहते हैं कि शरीर में भांति-भांति की सुगंध आती है। इससे तात्पर्य यही है कि ऎसे समय में पूर्वजन्मों के कर्मफल प्रकट होते हैं। पृथ्वी के समान धीरज और गंभीरता भी इसी महाभूत के परिपाक के समय आती है। महर्षि जैमिनि ने पाराशर की टक्कर में चरदशाध्याय में जीवनक्रम में परिवर्तन का रहस्य खोजने की कोशिश की। आत्मकारक की दशा में आत्म तत्व का चिंतन, अमात्यकारक की दशा में राजयोग या अमात्य पद प्राप्ति, भातृकारक की दशा में भाई-बहिनों से संबंधित फल प्राप्ति, कुछ विद्वान भातृकारक की दशा में ही पिता से संबंधित फल भी प्राप्त होना कहते हैं। मातृकारक की दशा में माता से संबंधित फलों की प्राप्ति, पुत्रकारक चरदशा की प्राप्ति में संतान से संबंधित फल प्राप्त होता है। ज्ञातिकारक की दशा में जीवन संघर्ष सामने आते हैं।
दाराकारक की दशा में दारा संबंधी अर्थात् कलत्र संबंधी परिणाम आते हैं। इन्हें एक दूसरे ढंग से देखा जाए तो ये चरकारक क्रमश: लग्न, द्वितीय भाव, तृतीय भाव, चतुर्थ भाव, पंचम भाव, षष्ठम भाव और फिर सप्तम भाव के फल देते हुए प्रतीत होते हैं, परन्तु दशाक्रम कभी भी इतने सीधे क्रम में नहीं होता। न ही उपरोक्त वर्णित पंच महाभूत फलाध्याय में महाभूतों के क्रम में छाया या कांति प्रकट होती है। इस क्रम को निर्धारित करना है भी मुश्किल क्योंकि प्रकृति द्वारा उत्पन्न भूतों का क्रम निर्धारण मनुष्य ने किया है। मनुष्य भला ईश्वर की लीला को कैसे समझ सकता है? इस अध्याय को समझने के लिए जो सबसे जटिल प्रक्रिया है उसे समझना प़डेगा। मान लीजिए सूर्य महादशा और चंद्रमा की अन्तर्दशा है। अग्नि महाभूत की दशा मे जल महाभूत की अन्तर्दशा।
हम जानते हैं कि अग्नि और जल के सम्मिलन से विक्षोभ उत्पन्न होता है। जल से भरी पानी की बाल्टी में धधकते हुए कोयल डाल दें तो क्या होगाक् जीवन में ही ऎसा ही होगा। फलित ज्योतिषी को अनुमान लगाना चाहिए कि फल किस सीमा तक जाएंगे। फल की मात्रा पंच महाभूतों के षोडश वर्ग व षडबल में बली या निर्बल होने पर निर्भर करेगा। सबसे अधिक कठिनाई तो यह होगी कि महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्मदशा और प्राणदशा इन पांच स्तरों पर पांच महाभूत मिलेंगे। आपसी द्वंद्व में किसे अधिक सफलता मिलेगीक् यहां ग्रह युद्ध का उदाहरण नहीं दिया जा सकता क्योंकि स्वयं पाराशर ऋषि कहते हैं कि महादशानाथ से अन्तर्दशानाथ और अन्तर्दशानाथ से प्रत्यंतर्दशानाथ अधिक बलवान होता है। फिर किसी ग्रह की सूक्ष्म दशा आई तो वह निष्फल कैसे हो सकता है? यहँ ज्योतिषी को अपने विवेक से निर्णय करना होगा। हम इसमें दो-तीन प्रणालियां विकसित कर सकते हैं और ऎसा इसलिए करना प़डेगा कि पाराशर ऋषि थो़डा सा बताकर चुप हो गए हैं।
1. या तो एक ही प्रकृति के पंचमहाभूत बहुमत में हो गए हों अर्थात् महादशा से प्राणदशा तक पांच महाभूतों के स्वामित्व में किन्हीं भी तीन दशाओं का स्वामी एक ही प्रकृति का महाभूत हो जाए।
2. समान धर्मा महाभूत महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर्दशा, सूक्ष्मदशा और प्राणदशा बहुमत मे आ जाए। जैसे अग्नितत्व और वायुतत्व में अधिक निकटता है। बजाए अग्नि तत्व व जल तत्व के। जल तत्व और पृथ्वी तत्व मे अधिक निकटता है। इस तरह से निकटतम महाभूत यदि बहुमत में आ जाएं अर्थात्पांच दशाओं में से तीन के अधिपति हो जाएं तो वे अपना फल दे जाएंगे।
3. षोडश वर्गो में व षडबलों में अत्यंत शक्तिशाली ग्रह अकेला ही परिणाम दे जाता है। जैसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के चंद्रमा 10 वर्गो में उत्तम हैं। अमिताभ बच्चान के बृहस्पति 16में से 9 वर्गो में उत्तम हैं। इन महाभूतों की छाया (कांति) जब प्रकट होगी तब चमत्कारिक परिणाम दृष्टिगोचर होंगे। 4. मित्र महाभूत भी उत्तम फल दे सकते हैं।

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