Relationship : टूटे रिश्तों का अंत नहीं, अब जिंदगी को मिल रहा है एक और शानदार मौका भारत में दूसरी शादी का बढ़ता क्रेज
By: Team Aapkisaheli | Posted: 10 Jun, 2026
भारतीय समाज पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़कर अब खुशियों को तरजीह देने लगा है। कभी जहां रिश्ते का टूटना जिंदगी का आखिरी पड़ाव मान लिया जाता था वहीं अब लोग अपने पुराने दर्द को भुलाकर नए सफर पर निकलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। देश में शादी और रिश्तों को लेकर एक बहुत ही खूबसूरत और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है जहां लोग खुलकर अपनी जिंदगी का दूसरा मौका चुन रहे हैं।
हर छठी शादी बन रही है नई शुरुआत: पिछले दस सालों में दूसरी शादी के लिए हमसफर तलाशने वाले लोगों की संख्या में तकरीबन 43 प्रतिशत का बड़ा उछाल आया है। साल 2016 में जहां केवल 11 प्रतिशत लोग दोबारा घर बसाने की सोच रहे थे। वहीं साल 2025 और 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 16 प्रतिशत हो चुका है। इसका मतलब है कि आज देश में होने वाली हर छह शादियों में से एक शादी दूसरी शादी होती है।
पहली बार शादी करने वाले भी बढ़ा रहे हैं कदम: अब पहली बार शादी के बंधन में बंधने वाले लोग भी तलाकशुदा पार्टनर के साथ जिंदगी शुरू करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखा रहे हैं। करीब 15 प्रतिशत ऐसे लोग जो पहली बार शादी कर रहे हैं वे तलाकशुदा प्रोफाइल्स को पसंद कर रहे हैं।
महानगरों में बड़ा असर: अगर बड़े महानगरों की बात करें तो वहां होने वाली कुल शादियों में से 30 प्रतिशत शादियों में कम से कम एक पार्टनर ऐसा होता है जो पहले किसी असफल रिश्ते से गुजर चुका है।
मानसिक स्वास्थ्य और थेरेपी पर खुलकर बात: लोग अब मानसिक शांति और आपसी तालमेल को लेकर काफी गंभीर हैं। यही वजह है कि नए रिश्ते की शुरुआत में ही करीब 41 प्रतिशत कपल मिलकर कपल थेरेपी या मैरिज काउंसलिंग कराने पर खुलकर चर्चा करते हैं।
डिजिटल दुनिया का मिला मजबूत साथ: अब हमसफर की तलाश केवल पुराने तौर-तरीकों या बिचौलियों के भरोसे नहीं है। इंटरनेट पर अब खास तौर पर दूसरी शादी के लिए कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ऐप्स मौजूद हैं जो लोगों को अपना नया पार्टनर चुनने में मदद कर रहे हैं।
परिवारों का बदला नजरिया और भरपूर सपोर्ट: सबसे बड़ा और सुखद बदलाव समाज और परिवार की सोच में आया है। कई मामलों में माता-पिता और सास-ससुर खुद आगे बढ़कर कम उम्र की विधवा बहू या तलाकशुदा बच्चों को दोबारा घर बसाने की हिम्मत दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ बड़े बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करने के लिए उनके अपने बच्चे खुद उनके लिए नया जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं।
भारतीय समाज अब शादियों को सिर्फ एक सामाजिक फर्ज के रूप में नहीं बल्कि व्यक्तिगत खुशी भावनात्मक संतुलन और मानसिक शांति के रूप में देख रहा है।
-हेमलता शर्मा, जयपुर
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