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Parenting : टीनएज बेटियों का बदलता व्यवहार सिर्फ मूड स्विंग नहीं इन संकेतों को पहचानें

By: Team Aapkisaheli | Posted: 13 Jun, 2026

Parenting : टीनएज बेटियों का बदलता व्यवहार सिर्फ मूड स्विंग नहीं इन संकेतों को पहचानें
​टीनएज यानी किशोरावस्था का दौर हर बच्चे के लिए एक बड़ा बदलाव लेकर आता है। खासकर बेटियों के लिए यह समय शारीरिक और मानसिक रूप से काफी संवेदनशील होता है। अक्सर माता-पिता लड़कियों के चिड़चिड़ेपन या उदासी को सामान्य मूड स्विंग मानकर छोड़ देते हैं लेकिन यह लापरवाही भारी पड़ सकती है। 
आज के दौर में किशोरियों पर मानसिक दबाव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है, जिसे समझने के लिए पेरेंट्स को अपना नजरिया बदलना होगा। इस विषय को गहराई से समझने के लिए किशोरियों के व्यवहार में आने वाले बदलावों और माता-पिता के लिए जरूरी टिप्स को बिंदुवार नीचे समझाया गया है। ​

शारीरिक बदलाव और मानसिक सहजता: 

प्यूबर्टी के दौरान लड़कियों के शरीर में तेजी से हार्मोनल बदलाव होते हैं। पीरियड्स की शुरुआत वजन का घटना-बढ़ना या चेहरे पर मुंहासे आना उन्हें मानसिक रूप से परेशान कर सकता है। इस समय माता-पिता को उनके लुक्स या शरीर को लेकर किसी भी तरह की टिप्पणी या मजाक करने से बचना चाहिए। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि यह बदलाव पूरी तरह से प्राकृतिक और सामान्य हैं। ​

डिजिटल दुनिया और परफेक्ट 

दिखने का प्रेशर: आजकल सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। रील और फिल्टर की दुनिया में लड़कियां खुद को परफेक्ट दिखाने के दबाव में जी रही हैं। वे खुद की तुलना दूसरों से करने लगती हैं जिससे उनका आत्मविश्वास कम होने लगता है। उन्हें पढ़ाई में भी अव्वल आना है और हर वक्त सुंदर भी दिखना है यह सोच उन्हें तनाव और एंग्जायटी की तरफ धकेल देती है। ​

असुरक्षा की भावना और रिजेक्शन का डर: 

टीनएज लड़कियों के मन में अक्सर यह डर बैठ जाता है कि अगर वे हर काम में परफेक्ट नहीं रहीं तो समाज या परिवार उन्हें पसंद नहीं करेगा। इस डर के कारण वे ओवरथिंकिंग का शिकार हो जाती हैं और बात-बात पर गुस्सा करने लगती हैं। वे अपनी कमियों को स्वीकार नहीं कर पातीं जिससे उनका मानसिक संतुलन प्रभावित होता है। ​

दोस्ती का महत्व और सोशल लाइफ: 

इस उम्र में सहेलियां सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं होतीं बल्कि एक बड़ा इमोशनल सपोर्ट बन जाती हैं। अगर सहेलियों से कोई अनबन हो जाए या ग्रुप में उन्हें नजरअंदाज किया जाए तो लड़कियां अंदर से टूट जाती हैं। माता-पिता को उनकी इन बातों को बचकाना कहकर टालना नहीं चाहिए क्योंकि यह उनके लिए एक गंभीर मुद्दा होता है। ​

पेरेंट्स के लिए जरूरी सलाह: 

बेटियों को इस मुश्किल दौर से निकालने के लिए पेरेंट्स को पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग सोचना होगा। ​बच्चों की केवल उनके नतीजों या सफलताओं के लिए तारीफ न करें बल्कि उनके द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना करें ताकि वे असफलताओं से डरें नहीं। घर का माहौल ऐसा बनाएं जहां गलतियां करने पर डांट की बजाय सुधार का मौका मिले जिससे बच्चे अपनी कमियां छिपाने के लिए झूठ न बोलें। ​

जब बेटी परेशान हो तो उसे लंबा भाषण या नसीहत देने के बजाय सिर्फ एक शांत श्रोता बनकर उसकी पूरी बात सुनें। ​उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि वे जैसी भी हैं परिवार उनसे बिना किसी शर्त के प्यार करता है जिससे उनके मन से रिजेक्शन का डर हमेशा के लिए निकल जाए। 

-हेमलता शर्मा, जयपुर

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