ओवरथिंकिंग..जब मन सुरक्षा और नियंत्रण के नाम पर कहानी गढ़ने लगता है
By: Team Aapkisaheli | Posted: 23 Feb, 2026
कभी ऐसा महसूस हुआ है कि शरीर थक गया है, पर मन रुकता ही नहीं? एक ही बात बार-बार लौटती है… हर संभावना का विश्लेषण… छोटी घटना में भी छिपा खतरा ढूँढ लेना। ओवरथिंकिंग सिर्फ ज्यादा सोचने की आदत नहीं है। यह अक्सर चिंता (Anxiety), असुरक्षा और आत्म-संदेह से जुड़ा एक गहरा मनोवैज्ञानिक पैटर्न है।
मन का इरादा गलत नहीं होता। वह हमें सुरक्षित रखना चाहता है। लेकिन जब सोच डर से संचालित होती है, तो वह वास्तविकता से ज्यादा कहानियाँ बनाने लगती है।
दरअसल ओवरथिंकिंग केवल चिंता नहीं है। यह मूलतः अनिश्चितता के भय से जन्मी एक अस्तित्वगत प्रतिक्रिया है।
मनुष्य का मन अर्थ खोजने के लिए बना है। जब कोई घटना होती है ..सुखद या दुखद ..मन तुरंत पूछता है: क्यों? यही क्यों हमारी समझ की शक्ति भी है और हमारी बेचैनी की जड़ भी। जब जीवन अनिश्चित लगता है, मन नियंत्रण खोजता है। और जहाँ नियंत्रण नहीं मिलता, वहाँ वह पैटर्न बना लेता है।
यहीं से ओवरथिंकिंग की असली शुरुआत होती है .. अनिश्चितता को सहन न कर पाना।
हमारे भीतर एक गहरा, अक्सर अनकहा डर छिपा होता है .. अगर चीजें मेरे नियंत्रण में नहीं हैं, तो मैं सुरक्षित कैसे रहूँ? इसी डर से दिमाग दो असंबंधित घटनाओं को जोड़ देता है और उन्हें कारण-परिणाम का रूप दे देता है।
एक उदाहरण से समझें….मान लीजिए एक व्यक्ति था जो रोज़ घर से निकलते समय मंदिर जाता था। धीरे-धीरे मंदिर उसके लिए केवल आस्था नहीं, बल्कि सुरक्षा का प्रतीक बन गया।
उसे विश्वास था कि यदि वह मंदिर नहीं जाएगा तो उसके साथ कुछ बुरा हो सकता है।
एक दिन वह जल्दी में मंदिर नहीं जा पाया, और उसी दिन रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया। दुर्घटना से अधिक उसे इस बात ने हिला दिया कि उसका डर सच साबित हो गया। अब उसके भीतर एक नया विश्वास जम गया .. मेरी सुरक्षा इस क्रिया पर निर्भर है।
यहीं मन ने एक False Association बना ली ..दो घटनाओं को जोड़कर एक कहानी गढ़ ली। जबकि दुर्घटना एक ट्रैफिक घटना भी हो सकती थी, एक संयोग। लेकिन हमारा मस्तिष्क randomness को स्वीकार नहीं करना चाहता। उसे कारण चाहिए। उसे अर्थ चाहिए। क्योंकि अर्थ मिलने से उसे नियंत्रण का भ्रम मिलता है ..और नियंत्रण से अस्थायी शांति।
मनोविज्ञान में इसे कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन कहा जाता है ..सोच की ऐसी विकृतियाँ जो तथ्य से अधिक भय पर आधारित होती हैं। जैसे: Rumination ..अतीत को बार-बार दोहराना। Catastrophizing ..छोटी घटना को बड़े खतरे में बदल देना। Illusion of Control — यह मान लेना कि कुछ विशेष व्यवहार ही हमें सुरक्षित रखेंगे। विडंबना यह है कि सुरक्षा की यही कोशिश बेचैनी को और गहरा कर देती है।
यहाँ CBT कैसे मदद करती है? Cognitive Behavioral Therapy (CBT) का आधार है: विचार → भावना → व्यवहार।
हम जैसा सोचते हैं, वैसा महसूस करते हैं, और वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं। उसी व्यक्ति से CBT क्या पूछेगी? क्या हर बार मंदिर न जाने पर दुर्घटना हुई? क्या कभी मंदिर जाने के बाद भी जीवन में कठिनाइयाँ आईं? क्या दुर्घटना का संबंध ट्रैफिक, परिस्थिति या बाहरी कारकों से हो सकता है?
इन प्रश्नों का उद्देश्य आस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि सोच की प्रक्रिया को परखना है।
CBT हमें सिखाती है कि .. विचार तथ्य नहीं होते, वे व्याख्याएँ होते हैं। इसे कहते हैं Cognitive Reframing ..कहानी को झुठलाना नहीं, बल्कि उसे संतुलित दृष्टि से देखना। धीरे-धीरे व्यक्ति सीखता है कि अनिश्चितता जीवन का हिस्सा है, सज़ा नहीं। और नियंत्रण की जगह स्वीकार आने लगता है।
ओवरथिंकिंग से बाहर निकलने की दिशाः ओवरथिंकिंग को बलपूर्वक रोकना संभव नहीं। पर उसे दिशा देना संभव है।
हर विचार पर तुरंत विश्वास न करें। पहले पूछें..क्या यह तथ्य है या मेरा डर? दिन में सीमित सोच समय तय करें। बिखरी सोच बोझ बनती है; सीमित सोच स्पष्टता देती है। छोटे कदम उठाएँ। क्रिया, चिंता से अधिक शक्तिशाली होती है।
यदि पैटर्न गहरे हों और जीवन प्रभावित हो रहा हो, तो किसी प्रशिक्षित काउंसलर या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से मार्गदर्शन लें।
सच यह है.. जीवन पूर्णतः नियंत्रित नहीं हो सकता। ओवरथिंकिंग उस प्रयास का परिणाम है जिसमें हम अनिश्चित दुनिया में पूर्ण सुरक्षा ढूँढना चाहते हैं। पर सच्ची शांति नियंत्रण से नहीं, स्वीकार से आती है।
जब हम यह मान लेते हैं कि हर संयोग संकेत नहीं होता, हर डर भविष्यवाणी नहीं होता तब मन धीरे-धीरे ढीला पड़ता है। ओवरथिंकिंग से मुक्ति विचारों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें समझने और चुनौती देने में है। और शायद वही क्षण .. जब मन कहानी गढ़ना छोड़कर वास्तविकता से मित्रता करना सीख लेता है ! भीतर की असली शांति की शुरुआत बन जाता है।
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