बच्चा छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोलने लगा है तो सिर्फ डांटें नहीं, पहले समझें इसकी वजह
By: Team Aapkisaheli | Posted: 14 Sep, 2026
बच्चों का कभी-कभार सच छिपाना या अपनी बात को थोड़ा बदलकर बताना देखकर पैरेंट्स परेशान हो जाते हैं। कई बार उन्हें लगता है कि बच्चा जानबूझकर झूठ बोल रहा है और अगर अभी नहीं रोका गया तो आगे चलकर यह उसकी आदत बन जाएगी। लेकिन हर झूठ के पीछे गलत इरादा हो, ऐसा जरूरी नहीं है। उम्र के साथ बच्चों की सोच, डर, कल्पना और अपनी बात मनवाने की इच्छा भी बदलती रहती है। कई बार बच्चा किसी परेशानी से बचने के लिए बात छिपाता है, तो कभी उसे लगता है कि सच बताने पर उसे डांट पड़ सकती है। इसलिए हर बार तुरंत सजा या डांट देने के बजाय यह समझना जरूरी है कि बच्चा आखिर सच क्यों नहीं बता रहा। वजह समझ आएगी, तभी उसका भरोसा भी जीता जा सकेगा और व्यवहार में सही बदलाव लाना आसान होगा।
गलती छिपाने का डरकई बच्चे गलती होने के बाद इसलिए झूठ बोलते हैं क्योंकि उन्हें डांट, सजा या माता-पिता की नाराजगी का डर रहता है। अगर बच्चा गिलास तोड़ने, होमवर्क पूरा न करने या कोई चीज खराब करने के बाद तुरंत कह देता है कि उसने ऐसा नहीं किया, तो सिर्फ झूठ पर ध्यान देने के बजाय उसके डर को समझें। उसे यह भरोसा देना जरूरी है कि गलती स्वीकार करने पर पहले बात सुनी जाएगी। इसका मतलब यह नहीं कि गलती को नजरअंदाज किया जाए, बल्कि बच्चे को यह महसूस कराया जाए कि सच बोलना उसके लिए ज्यादा सुरक्षित है। धीरे-धीरे उसे समझ आने लगता है कि गलती छिपाने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि सच बताने से उसे सुधारने का मौका मिलता है।
ध्यान पाने की कोशिशकभी-कभी बच्चा ऐसी बातें बताने लगता है जो हुई ही नहीं, क्योंकि उसे लगता है कि इससे सबका ध्यान उसकी तरफ आएगा। खासकर जब घर में पढ़ाई, काम या दूसरे जरूरी कामों के बीच बच्चे को कम समय मिल रहा हो, तब वह अपनी बात को रोचक बनाकर पेश कर सकता है। ऐसी स्थिति में हर बात को झूठ कहकर रोकना बच्चे को और ज्यादा परेशान कर सकता है। उसकी बात ध्यान से सुनें और पूछें कि उसने ऐसा क्यों कहा। साथ ही, रोज थोड़ी देर ऐसा समय निकालना मददगार हो सकता है जिसमें बच्चा बिना किसी खास वजह के अपनी बातें साझा कर सके। इससे उसे ध्यान खींचने के लिए कहानी बनाने की जरूरत कम महसूस हो सकती है।
कल्पना को झूठ न मानेंछोटे बच्चे कई बार कल्पना और वास्तविकता के बीच साफ फर्क नहीं कर पाते। वे अपनी बनाई हुई कहानी को इतने भरोसे से बताते हैं कि माता-पिता को लगता है कि बच्चा झूठ बोल रहा है। जैसे किसी काल्पनिक दोस्त का जिक्र करना, किसी खिलौने को इंसान की तरह समझना या किसी घटना को अपनी कल्पना से बड़ा बनाकर बताना हमेशा जानबूझकर बोला गया झूठ नहीं होता। ऐसे समय पर बच्चे को तुरंत गलत साबित करने के बजाय उसकी कल्पना को समझें और धीरे से पूछें कि यह सच में हुआ था या वह इसे अपनी कहानी की तरह बता रहा है। इससे बच्चा बिना शर्मिंदा हुए वास्तविकता और कल्पना के बीच अंतर समझना सीख सकता है।
अपनी बात मनवानाकुछ बच्चे अपनी इच्छा पूरी कराने के लिए बात को बदलकर बताते हैं। मसलन, वे कह सकते हैं कि किसी दोस्त को भी वही खिलौना मिला है या सब बच्चों को कोई खास चीज करने की इजाजत है। यहां बच्चे को सिर्फ झूठ बोलने वाला कहने के बजाय उसकी इच्छा को समझना ज्यादा जरूरी है। उससे सीधे पूछें कि वह असल में क्या चाहता है। अगर उसकी मांग पूरी नहीं हो सकती, तो साफ और शांत तरीके से वजह बताएं। इससे उसे यह सीखने में मदद मिलेगी कि अपनी पसंद या मांग बताने के लिए गलत जानकारी देने की जरूरत नहीं है। साथ ही, हर मांग पूरी न होने पर उसे निराशा संभालना भी धीरे-धीरे सीखना चाहिए।
सच बोलने की जगह देंबच्चे से सच बोलने की उम्मीद तभी मजबूत होगी जब घर में उसे अपनी बात रखने की जगह भी मिले। अगर वह कोई बात बताने आए तो बीच में रोकने, तुरंत फैसला सुनाने या पुराने मामलों का हवाला देने के बजाय पहले पूरी बात सुनें। अगर उसने सच स्वीकार किया है, तो उसकी ईमानदारी को भी पहचानें, भले ही गलती हुई हो। इसका अर्थ अनुशासन खत्म करना नहीं है; बल्कि बच्चे को यह समझाना है कि गलत काम का परिणाम हो सकता है, लेकिन सच बोलना हमेशा सही कदम है। अगर झूठ बोलने का व्यवहार लगातार बढ़ रहा हो, बच्चा बहुत डरा हुआ दिखे या किसी गंभीर परेशानी को छिपाने की आशंका हो, तो स्थिति को गंभीरता से समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना बेहतर हो सकता है।
# 5 घरेलू उपचार,पुरूषों के बाल झडना बंद