Fashion Funda : राजस्थान की चुनरी और ओढ़नियाँ परंपरा और संस्कृति का अनूठा संगम
By: Team Aapkisaheli | Posted: 25 Mar, 2026
राजस्थान की रंगीली संस्कृति में चुनरी मात्र एक वस्त्र नहीं बल्कि मान मर्यादा परंपरा और अटूट विश्वास का प्रतीक है। राजस्थान की रेतीली धरती पर जहाँ प्रकृति के रंगों की कमी रही है वहाँ के निवासियों ने अपने पहनावे में सतरंगी रंगों को घोलकर इस कमी को पूरा किया है।
राजस्थान अपनी विविध लोक कलाओं और हस्तशिल्प के लिए विश्व प्रसिद्ध है और इनमें बंधेज या बंधनी कला से तैयार की गई चुनरी का स्थान सर्वोपरि है।
राजस्थानी संस्कृति में चुनरी का महत्व:
राजस्थानी संस्कृति में लाल और गुलाबी रंग की चुनरी को सुहाग की निशानी माना जाता है। विवाह के समय वधू द्वारा चुनरी ओढ़ना एक अनिवार्य परंपरा है।
चाहे तीज हो गणगौर हो या घर की कोई पूजा पाठ चुनरी के बिना हर उत्सव अधूरा माना जाता है। विशेष रूप से पीला पोंचा जो पीले रंग की चुनरी होती है वह संतान जन्म के समय मातृशक्ति के सम्मान में ओढ़ा जाता है जो वंश वृद्धि और खुशहाली का संकेत है। राजस्थान के लोक गीतों और साहित्य में भी चुनरी का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है।
राजस्थानी चुनरी और ओढ़नियों के प्रमुख प्रकार: राजस्थानी कारीगरी में रंगों को बांधने और रंगने की तकनीक के आधार पर इन्हें मुख्य रूप से कई श्रेणियों में बांटा गया है।
लहरिया: राजस्थान की सबसे लोकप्रिय शैली है। इसमें कपड़े पर आड़ी तिरछी धारियां होती हैं जो समुद्र की लहर जैसी प्रतीत होती हैं। यह विशेष रूप से सावन के महीने और तीज के त्योहार पर ओढ़ा जाता है। मारवाड़ और जयपुर का समुद्र लहरिया अत्यंत प्रसिद्ध है।
मोठड़ा: तब बनता है जब लहरिया की धारियां एक दूसरे को काटती हुई छोटे छोटे चौकोर खाने बनाती हैं। इसे मांगलिक कार्यों में बहुत शुभ माना जाता है। मोठड़ा की पगड़ी और चुनरी राजस्थानी शान का प्रतीक है।
पोंचा: एक विशेष प्रकार की ओढ़नी है जिसके बीच में एक बड़ा गोला होता है और चारों कोनों पर छोटे गोले होते हैं। इसका आधार रंग पीला या गुलाबी होता है।
पीला पोंचा: पुत्र के जन्म पर प्रसूता को पीहर पक्ष की ओर से दिया जाता है जो वंश वृद्धि का प्रतीक है जबकि गुलाबी पोंचा पुत्री के जन्म के अवसर पर ओढ़ा जाता है।
धनक: यह शब्द धनुष से आया है। इसमें कपड़े पर बड़ी बड़ी बिंदियाँ या चौकोर आकृतियाँ बनाई जाती हैं। इसके रंग बेहद गहरे और चमकदार होते हैं जो दूर से ही आकर्षित करते हैं।
पारंपरिक बंधेज: चुनरी में लाल रंग की प्रधानता होती है और उस पर सफेद या पीले रंग की छोटी छोटी बिंदियों का बारीक काम होता है। इसे देवी पूजन और विवाह के समय अनिवार्य माना जाता है।
इसके अलावा भी ओढ़नियों की कुछ अन्य शैलियाँ प्रचलित हैं। शिकारगाह में बंधेज के माध्यम से पशु पक्षियों और शिकार के दृश्य उकेरे जाते हैं। एक डाली में एक ही रंग की बिंदियों का काम होता है।
बावन बाग में कपड़े पर बावन अलग अलग तरह के छोटे छोटे ब्लॉक या डिजाइन बनाए जाते हैं।
राजस्थानी चुनरी की असल पहचान उसके पक्के रंग और बारीक बंधेज से होती है। जितना बारीक बंधेज होगा चुनरी उतनी ही कीमती और कलात्मक मानी जाती है। राजस्थान की चुनरी केवल धागों और रंगों का संगम नहीं है बल्कि यह राजस्थान की मिट्टी की महक और सदियों पुरानी परंपराओं की जीवंत विरासत है।
-हेमलता शर्मा, जयपुर
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