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Career : कोडिंग के दौर में कंक्रीट का कमबैक क्यों आईआईटी टॉपर्स अब चुन रहे हैं सिविल इंजीनियरिंग

By: Team Aapkisaheli | Posted: 23 Jun, 2026

Career : कोडिंग के दौर में कंक्रीट का कमबैक क्यों आईआईटी टॉपर्स अब चुन रहे हैं सिविल इंजीनियरिंग
​आईआईटी एडमिशन में सालों पुराना कंप्यूटर साइंस का एकछत्र राज अब डगमगा रहा है। साल दो हजार छब्बीस के एडमिशन सीजन में एक नया और दूरदर्शी ट्रेंड सामने आया है जहाँ टॉप रैंकर्स भेड़चाल से बाहर निकलकर सिविल इंजीनियरिंग को प्राथमिकता दे रहे हैं। ​
इस बदलाव की पुष्टि जोसा काउंसलिंग के पहले दौर के आंकड़े भी करते हैं। आईआईटी बॉम्बे में सिविल की ओपनिंग रैंक पिछले साल के दो हजार छह सौ छियासठ से उछलकर सीधे तीन सौ पचासी पर आ गई है। वहीं आईआईटी दिल्ली में यह और भी बड़ा उलटफेर दिखाते हुए तीन हजार तीस से घटकर सीधे एक सौ नवासी पर पहुंच गई है। इसका मतलब यह नहीं कि कंप्यूटर साइंस का क्रेज खत्म हो गया है, बल्कि टॉप सौ के बाद के छात्र अब अपने लॉन्ग-टर्म करियर को लेकर ज्यादा व्यावहारिक फैसले ले रहे हैं। ​

आखिर क्यों बदल रहा है टॉपर्स का नजरिया: ​

AI का प्रभाव: 

जनरेटिव एआई टूल्स अब शुरुआती स्तर की कोडिंग और सॉफ्टवेयर डीबगिंग जैसे काम आसानी से करने लगे हैं। जिससे सिर्फ कोडिंग के भरोसे रहने वाले टेक करियर की आजीवन सुरक्षा पर सवाल उठने लगे हैं। ​

ऐतिहासिक इंफ्रास्ट्रक्चर बूम: 
भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन साइट बना हुआ है। नए एक्सप्रेसवे बुलेट ट्रेन कॉरिडोर, मेट्रो नेटवर्क और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के कारण सिविल इंजीनियरों की मांग तेजी से बढ़ी है। सॉफ्टवेयर की तेजी से बदलती दुनिया के मुकाबले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स दशकों तक स्थिरता प्रदान करते हैं। ​

हाई-टेक हुई सिविल: 

क्या है भविष्य का स्कोप:

​आज की सिविल इंजीनियरिंग सिर्फ सीमेंट-कंक्रीट तक सीमित नहीं है बल्कि यह कोर इंजीनियरिंग और आधुनिक टेक्नोलॉजी का एक बेहतरीन फ्यूजन बन चुकी है:

​स्मार्ट सिटी और अर्बन प्लानिंग: 

भविष्य के ऑटोमैटिक और डेटा-ड्रिवन शहरों को डिजाइन करने के लिए डेटा साइंस और एआई के जानकार इंजीनियरों की भारी मांग है। ​

डिजिटल कंस्ट्रक्शन: 

आईआईटी के क्लासरूम्स अब आधुनिक हो चुके हैं जहाँ छात्र मशीन लर्निंग फॉर रिमोट सेंसिंग और डिजिटल ट्विंस जैसी तकनीकों से निर्माण कार्य से पहले ही कंप्यूटर पर सटीक मॉडल तैयार करना सीख रहे है। ​

सस्टेनेबिलिटी और ग्रीन इंजीनियरिंग: 

क्लाइमेट चेंज की चुनौतियों से निपटने के लिए जीरो-कार्बन बिल्डिंग्स और वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में ग्लोबल स्तर पर बड़े अवसर उभर रहे हैं। 

स्मार्ट मोबिलिटी: 

हाइपरलूप पॉड टैक्सी और हाई-स्पीड ट्रांसपोर्ट सिस्टम को डिजाइन करने के लिए जीआईएस और एडवांस प्लानिंग टूल्स का इस्तेमाल हो रहा है। 

ग्लोबल अपॉर्चुनिटीज: अमेरिका के इंफ्रास्ट्रक्चर एक्ट और यूरोपियन ग्रीन डील जैसे वैश्विक निवेशों के कारण इस फील्ड के कुशल इंजीनियरों के लिए विदेशों में भी असीमित मौके हैं। ​

संक्षेप में कहें तो छात्र अब शुरुआती सैलरी के शॉर्ट-टर्म फायदे से आगे बढ़कर देख रहे हैं। आने वाले चालीस सालों तक करियर की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वे नए आईआईटी में कंप्यूटर साइंस की सीट छोड़ने का हौसला दिखा रहे हैं और देश के टॉप-तीन पुराने आईआईटी की विरासत नेटवर्क और कोर ब्रांचेज को चुन रहे हैं। 

 -हेमलता शर्मा, जयपुर

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