अल्फ़ाज़, अंदाज़ और आवाज़ें: द मुशायरा ने मुंबई पर किया जादू
By: Team Aapkisaheli | Posted: 09 Feb, 2026

ट्रियो – सेट ऑफ थ्री आर्ट्स की जानिब से एक लाजवाब सांस्कृतिक पेशकश मुंबई। मुंबई की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे हसीन लम्हे आते हैं जब लगता है मानो वक्त ठहर गया हो। कल की रात भी कुछ ऐसी ही थी। भवन कल्चरल सेंटर अदब की रोशनी से सराबोर हो गया, जब ट्रियो – सेट ऑफ थ्री आर्ट्स ने द मुशायरा का एक तारीख़ी (ऐतिहासिक) जश्न मनाया।
मशहूर मीडिया प्रोफेशनल और ट्रियो की मैनेजिंग डायरेक्टर शीबा लतीफ़ की देख-रेख में सजी यह शाम महज़ एक महफ़िल नहीं थी, बल्कि एक ऐसी धड़कन थी जिसने मुंबई को उसकी तहज़ीब और रूहानी विरासत की याद दिला दी। इस महफ़िल में लफ़्ज़ों के जादूगरों की एक कहकशां (आकाशगंगा) सिमट आई थी—जहाँ पुराने उस्तादों और नए दौर के शायरों ने मिलकर इस्तआरों (metaphors) का ऐसा जाल बुना कि रिवायत और जदीदियत (modernity) के बीच की दूरी मिट गई।
शाम की रौनक़ उस वक़्त और बढ़ गई जब भारतीय सिनेमा और संगीत के बड़े नाम महफ़िल की ज़ीनत बने। मंझे हुए अदाकार कंवलजीत सिंह के साथ बुलंद आवाज़ गायक जसपिंदर नरूला, कविता सेठ और जसविंदर सिंह की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि शायरी और मौसीकी का चोली-दामन का साथ है।
महफ़िल में संगीतकार कुलदीप सिंह और दिलीप सेन, और मशहूर अदाकार लिलिपुट, विजय कश्यप, अश्विन कौशल और अनिल चरणजीत जैसे फनकार भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी इस बात की गवाह थी कि ज़माना भले ही बदल जाए, पर उम्दा शायरी का जादू हर दिल को अपनी तरफ खींच ही लेता है।
फनकारी का सफ़र: एक दिलकश मंज़रनामाः मंच पर जज़्बातों और ख्यालों का सफ़र कुछ इस तरह तय हुआ।
रूहानी शुरुआत: शीबा लतीफ़ ने बेहद नफ़ासत और सादगी के साथ शाम का आगाज़ किया। उनकी रूमानी ग़ज़लों ने महफ़िल में एक नर्म और दिलकश माहौल पैदा कर दिया।
निज़ामत की महारत: अल्तमश अब्बास ने नाज़िम (anchor) के तौर पर बागडोर संभाली। उनके लफ़्ज़ों के हेर-फेर और गुफ़्तगू के अंदाज़ ने पूरी महफ़िल को एक धागे में पिरोए रखा।
सोच और सांचा: उस्ताद शायर हसन कमाल ने अपनी पुर-असर नज़्म से लोगों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद राजेश रेड्डी ने अपनी ग़ज़ल-गोई के फन से पूरी महफ़िल पर सन्नाटा तारी कर दिया।
ज़हन और ज़ुबान: नुसरत मेहंदी ने अपनी फिक्री (intellectual) शायरी से ज़हन को झकझोरा, जबकि शकील आज़मी को उनकी अनोखी गहराई और शानदार अंदाज़-ए-बयां के लिए ज़बरदस्त दाद मिली।
जोश और जुड़ाव: महफ़िल अपने उरूज (top) पर तब पहुँची जब काशिफ़ रज़ा और तस्लीम आरफी ने सामईन (audience) के साथ एक सीधा और जोश भरा रिश्ता कायम किया। रियाज़ सागर की पेशकश को भी बहुत सराहा गया, और अल्तमश अब्बास ने अपनी ज़ोरदार शायरी से महफ़िल में नई रूह फूंक दी।
एक बा-असर जमावड़ाः इस जलसे की गरिमा को इन मोहतरम शख़्सियतों ने और बुलंद किया।
मेहमान-ए-खुसूसी: डॉ. अब्दुल रज़ाक बाबा चौधरी (पूर्व सलाहकार सदस्य, भारत सरकार)।
सदारत: फ़ज़लुर रहमान अंसारी (सद्र, बिजनौर वेलफेयर सोसाइटी)।
विशेष अतिथि: हार्दिक खत्री (संस्थापक व सीईओ, अवतरण कैपिटल) और अबरार अलवी (एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर व सीएमओ, श्रीराम जनरल इंश्योरेंस)।
हमारा मानना है कि जब कहानी और संगीत का मेल होता है, तो एक तिलिस्म पैदा होता है। आज की रात इस बात का सबूत थी कि अगर फन को सही मंच मिले, तो वह हर दिल की ज़ुबान बन जाता है।
— शीबा लतीफ़, मैनेजिंग डायरेक्टर, ट्रियो – सेट ऑफ थ्री आर्ट्स
रिवायत का कारवांः जब आखिरी अशआर गूंजे, तो पैगाम साफ़ था। मुशायरा सिर्फ गुज़रे ज़माने की याद नहीं, बल्कि इत्तेहाद (unity) की एक ज़िंदा ताकत है। चेयरमैन अल्तमश अब्बास और सरपरस्त-ए-आला काशिफ़ रज़ा के मुताबिक, यह तो बस एक शुरुआत है। भविष्य में इससे भी बड़े और यादगार प्रोग्रामों की तैयारी है।
ट्रियो – सेट ऑफ थ्री आर्ट्स आज के दौर में ज़ुबान की पाकीज़गी और तहज़ीब की हिफ़ाज़त के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इस डिजिटल शोर-शराबे की दुनिया में, द मुशायरा लफ़्ज़ों की ताक़त की एक ज़रूरी याददिहानी थी—एक ऐसी रात जहाँ मुंबई ने सिर्फ सुना नहीं, बल्कि दिल से महसूस किया।
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