मंदिर में परिक्रमा लगाने की परंपरा क्यों है, जानें धार्मिक मान्यता
By: Team Aapkisaheli | Posted: 05 Oct, 2026
हिंदू धर्म में मंदिर जाना केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इससे जुड़ी कई परंपराओं का भी विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है देवी-देवताओं की परिक्रमा करना। मंदिर में दर्शन और पूजा के बाद श्रद्धालु भगवान की प्रतिमा या गर्भगृह के चारों ओर घूमते हैं। इसे प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, परिक्रमा करते समय भक्त अपने आराध्य को केंद्र में रखते हैं और स्वयं को उनकी कृपा के प्रति समर्पित करने का भाव रखते हैं। अलग-अलग मंदिरों और परंपराओं में परिक्रमा की संख्या और तरीका अलग हो सकता है। कहीं एक परिक्रमा की जाती है, तो कहीं विशेष संख्या में प्रदक्षिणा करने की परंपरा होती है। इसका उद्देश्य केवल एक धार्मिक क्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि मन में श्रद्धा, विनम्रता और ईश्वर के प्रति विश्वास का भाव बनाए रखना भी माना जाता है।
भगवान को केंद्र में रखने का भाव
परिक्रमा की सबसे प्रमुख धार्मिक व्याख्या यही मानी जाती है कि इसमें भक्त अपने आराध्य को केंद्र में रखकर उनके चारों ओर घूमता है। यह भाव व्यक्ति को याद दिलाता है कि उसके जीवन में ईश्वर और आध्यात्मिक विश्वास का एक विशेष स्थान है। परिक्रमा करते समय श्रद्धालु मन ही मन प्रार्थना, मंत्र या अपने आराध्य का नाम जप सकता है। इस दौरान ध्यान कुछ समय के लिए बाहरी गतिविधियों से हटकर पूजा और आस्था की ओर केंद्रित होता है।
प्रदक्षिणा में समर्पण और श्रद्धा का भाव
धार्मिक परंपरा में परिक्रमा को समर्पण से भी जोड़ा जाता है। भक्त भगवान के सामने अपनी इच्छाओं, चिंताओं और भावनाओं को रखते हुए यह स्वीकार करता है कि वह अपने आराध्य पर विश्वास करता है। मंदिर के चारों ओर शांत भाव से चलना पूजा के दौरान मन को स्थिर करने वाली एक परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इसका आध्यात्मिक अनुभव हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है और इसका महत्व मुख्य रूप से उसकी आस्था से जुड़ा है।
अलग देवी-देवताओं के मंदिरों में अलग परंपराएं
हर मंदिर में परिक्रमा का तरीका एक जैसा नहीं होता। अलग-अलग संप्रदायों, मंदिरों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार प्रदक्षिणा की दिशा, संख्या और नियम अलग हो सकते हैं। कुछ स्थानों पर गर्भगृह की संरचना के कारण पूरी परिक्रमा संभव नहीं होती। कुछ देवी-देवताओं की पूजा पद्धति में विशेष प्रकार की प्रदक्षिणा का उल्लेख मिलता है। इसलिए किसी मंदिर में परिक्रमा करते समय वहां की स्थानीय परंपरा और पुजारी के निर्देश का पालन करना उचित माना जाता है।
परिक्रमा के दौरान मन को रखें शांत
परिक्रमा केवल चलने की प्रक्रिया न रह जाए, इसके लिए श्रद्धालु इसे ध्यान और प्रार्थना के भाव के साथ करते हैं। धीरे-धीरे चलना, भगवान का नाम स्मरण करना और मन को इधर-उधर भटकने से रोकना इस परंपरा को अधिक भावपूर्ण बना सकता है। मंदिर में भीड़ होने पर दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना जरूरी है। परिक्रमा के दौरान जल्दबाजी या धक्का-मुक्की करने के बजाय शांत और अनुशासित रहना धार्मिक वातावरण के अनुरूप माना जाता है।
परंपरा के पीछे जुड़ा है आस्था और सम्मान
मंदिर में परिक्रमा की परंपरा सदियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा है। इसका मूल भाव अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सम्मान व्यक्त करना माना जाता है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इससे जुड़ी मान्यताएं भी अलग हो सकती हैं। इसलिए परिक्रमा को किसी एक नियम में बांधने के बजाय अपनी धार्मिक परंपरा और मंदिर की व्यवस्था को समझना बेहतर है। इस परंपरा का महत्व भक्त की श्रद्धा और उस भाव में है जिसके साथ वह अपने आराध्य के सामने उपस्थित होता है।
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