Moms & Baby Care : प्रेग्नेंसी में ये छोटी लापरवाही पड़ सकती है भारी, जेस्टेशनल डायबिटीज से बढ़ा जोखिम : डॉ. मीरा पाठक
By: Team Aapkisaheli | Posted: 05 Jan, 2026
नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान शुगर यानी जेस्टेशनल डायबिटीज आजकल महिलाओं के लिए एक बड़ी और गंभीर समस्या बनती जा रही है। जिला अस्पतालों से लेकर सीएचसी और पीएचसी तक इलाज कराने पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या में डेढ़ से दो गुना तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। गायनेकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मीरा पाठक ने इस पर खास बातचीत की।
डॉ. मीरा पाठक ने बताया कि जेस्टेशनल डायबिटीज वह स्थिति होती है जिसमें किसी महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या होती है। आमतौर पर यह समस्या प्रेग्नेंसी के 24 से 26 हफ्ते यानी छठे या सातवें महीने में सामने आती है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद और पोस्टपार्टम पीरियड पूरा होने पर ब्लड शुगर लेवल अपने आप नॉर्मल हो जाता है।
डॉ. मीरा के अनुसार, जेस्टेशनल डायबिटीज होने का मुख्य कारण प्लेसेंटा से निकलने वाले कुछ हार्मोन होते हैं। ये हार्मोन शरीर की कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति रेजिस्टेंट बना देते हैं। इसके चलते शरीर में शुगर लेवल बढ़ जाता है। यही हार्मोन जब ज्यादा मात्रा में बनते हैं तो वे मां के साथ-साथ बच्चे पर भी असर डालते हैं।
इससे बचने के लिए सबसे जरूरी है समय पर स्क्रीनिंग।
जब भी कोई महिला पहली बार एंटीनेटल चेकअप के लिए जाती है, उसे रैंडम ब्लड शुगर की जांच जरूर करानी चाहिए। इसके अलावा, कुछ महिलाएं हाई रिस्क कैटेगरी में आती हैं, जैसे ज्यादा वजन होना, 35 साल के बाद पहली प्रेग्नेंसी, परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री, प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर, पहले बार-बार मिसकैरेज होना, पेट में बच्चे की मौत होना, पिछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज रहना या पहले चार किलो से ज्यादा वजन का बच्चा पैदा होना।
ऐसी महिलाओं के लिए 24 से 26 हफ्ते के बीच ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराना बेहद जरूरी होता है।
अगर इस दौरान लापरवाही बरती जाए तो इसका असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है। मां को बार-बार इंफेक्शन हो सकता है, पानी ज्यादा बनने की समस्या हो सकती है, मिसकैरेज या प्री-टर्म डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है। वहीं बच्चे पर इसका असर यह हो सकता है कि बच्चा या तो बहुत कमजोर पैदा हो या फिर जरूरत से ज्यादा वजन का यानी चार किलो से ऊपर का हो। डिलीवरी के तुरंत बाद भी खतरा खत्म नहीं होता। ऐसे बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर कम होने की संभावना रहती है और पीलिया का खतरा भी ज्यादा होता है। इसलिए डॉक्टर लगातार मॉनिटरिंग की सलाह देते हैं।
डॉ. मीरा पाठक कहती हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने का सबसे आसान और असरदार तरीका है स्मार्ट लाइफस्टाइल अपनाना। इसका मतलब है संतुलित आहार लेना। दिन में तीन बड़े खाने की बजाय छोटे-छोटे और बार-बार खाने की आदत डालें। हर दो से तीन घंटे में थोड़ा-थोड़ा खाना बेहतर रहता है। प्लेट का आधा हिस्सा हरी सब्जियों और सलाद से भरें। दाल, दही, लस्सी, पनीर और अंडा जैसी चीजों को डाइट में शामिल करें।
दूसरी सबसे जरूरी बात है हिडन शुगर से बचना। हिडन शुगर वे चीजें होती हैं जो स्वाद में ज्यादा मीठी नहीं लगतीं, लेकिन उनमें शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। जैसे पैकेट वाला नारियल पानी, पैकेज्ड फ्रूट जूस, फ्लेवर्ड दूध, फ्लेवर्ड दही, ब्राउन ब्रेड, व्हाइट ब्रेड, पाव, बन, सीरियल्स, सैंडविच स्प्रेड, मेयोनीज, बिस्किट, रस्क, केक और मफिन। इन चीजों से दूरी बनाना बेहद जरूरी है।
एक आम गलतफहमी यह भी है कि प्रेग्नेंसी में दो लोगों के लिए खाना चाहिए।
डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। पहले तीन महीने उतना ही खाएं जितना पहले खाती थीं। दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में अतिरिक्त मील जोड़ना काफी होता है।
इसके अलावा, डॉक्टर की सलाह से रोजाना आधा घंटा हल्की एक्सरसाइज जरूर करें। हल्की वॉक, प्रेग्नेंसी योगा या हर मील के बाद 10-15 मिनट टहलना भी काफी फायदेमंद होता है। जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ने से बचें। पूरी प्रेग्नेंसी में करीब 10 से 11 किलो वजन बढ़ना सामान्य माना जाता है। खाना न छोड़ें, पूरी नींद लें, कम से कम 7-8 घंटे सोने की कोशिश करें और तनाव से दूर रहें। ये सभी बातें मिलकर जेस्टेशनल डायबिटीज को रोकने में मदद करती हैं।
कुछ ऐसे लक्षण भी होते हैं जिन पर गर्भवती महिलाओं को खास ध्यान देना चाहिए, जैसे बार-बार ज्यादा भूख लगना, ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बार-बार इंफेक्शन होना, बार-बार फंगल इंफेक्शन और बीपी का बढ़ना। अल्ट्रासाउंड में अगर एम्नियोटिक फ्लूड ज्यादा दिखे, बच्चे का वजन बहुत तेजी से बढ़े या बच्चा कमजोर लगे, तो तुरंत ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। -आईएएनएस
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