सावधान कहीं आपकी ये 5 आदतें बच्चों को बुढ़ापे में आपसे दूर न कर दें, आज ही बदलें अपना पेरेंटिंग स्टाइल
By: Team Aapkisaheli | Posted: 31 May, 2026
हर माता-पिता का सपना होता है कि बुढ़ापे में उनका बच्चा उनका सबसे बड़ा सहारा बने। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी ऑफिस के तनाव और डिजिटल व्यस्तता के बीच अनजाने में पेरेंट्स कुछ ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जो बच्चों के कोमल मन पर गहरे घाव छोड़ जाती हैं।
बच्चों की भावनाओं को छोटा या बचपना समझकर नजरअंदाज करना या अपनी बात मनवाने के लिए ईगो का सहारा लेना भविष्य में माता-पिता और बच्चों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर देता है जिसे ढहाना नामुमकिन हो जाता है। कई बार स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि बच्चे बड़े होकर माता-पिता से मिलना तक छोड़ देते हैं। इसलिए समय रहते पेरेंटिंग के इस संवेदनशील पहलू को समझना बेहद जरूरी है।
इन 5 गलत आदतों को तुरंत बदलना है जरूरी: बच्चों की भावनाओं को ड्रामा समझना: जब बच्चा परेशान होकर रोता है तो अक्सर पेरेंट्स कह देते हैं कि तुम्हें तो हमेशा नौटंकी करने की आदत है। यह रवैया बच्चे का भरोसा तोड़ देता है और वह अपनी भावनाएं छुपाने लगता है।
अहंकार को बीच में लाना: अक्सर बच्चे के बात न मानने पर पेरेंट्स इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लेते हैं। मेरी बात टालने की हिम्मत कैसे हुई वाली सोच बच्चों के मन में सम्मान नहीं बल्कि खौफ और दूरी पैदा करती है।
बच्चों को समय न देना: वर्किंग लाइफ के बाद बचा हुआ समय भी जब रील स्क्रॉल करने या सोशल मीडिया में बीत जाता है तो बच्चा अकेलापन महसूस करता है। बचपन में समय न मिलने पर वह बड़े होकर आपको अपने समय से बेदखल कर सकता है।
बात-बात पर नीचा दिखाना: दूसरों के बच्चों से तुलना करना या सबके सामने बच्चे को डांटना-मारना उनके आत्मविश्वास को खत्म कर देता है। इससे बच्चे मन ही मन माता-पिता के प्रति नकारात्मक भाव विकसित कर लेते हैं।
घर में तानाशाही चलाना: घर का माहौल ऐसा रखना जहाँ सिर्फ माता-पिता का हुक्म चले और बच्चे को अपनी राय रखने का हक न हो रिश्ते को खत्म कर देता है। बच्चा बड़ा होते ही ऐसे माहौल से भागने की कोशिश करता है।
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डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं: रोज कम से कम आधा घंटा ऐसा निकालें जिसमें आपके और बच्चे के बीच कोई फोन या टीवी न हो। इस दौरान उनके दिल की बातें सुनें।
बच्चों को भी सम्मान दें: बच्चों पर हुक्म चलाने के बजाय उनके विचारों को तवज्जो दें। यदि वे कोई गलती करते हैं तो उन्हें सबके सामने डांटने के बजाय अकेले में समझाएं।
सख्त जज नहीं अच्छे श्रोता बनें: जब बच्चा अपनी कोई समस्या लेकर आए तो उसे डांटने के बजाय पहले उसकी पूरी बात ध्यान से सुनें ताकि उसका भरोसा आप पर बना रहे।
अपनेपन का माहौल बनाएं: अनुशासन जरूरी है लेकिन वह डर पर आधारित नहीं होना चाहिए। घर का वातावरण ऐसा रखें जहाँ बच्चा अपनी गलतियाँ भी बिना किसी डर के आपके सामने स्वीकार कर सके।
-हेमलता शर्मा, जयपुर
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