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क्यों गुम हो जाती हैं पहचान

By: Team Aapkisaheli | Posted: 11 July, 2012

क्यों गुम हो जाती हैं पहचान
आज महानगरों की महिलाओं ने अपनी लगन व मेहनत के बलबूते पर अपनी पहचान खुद बनाई है, फिर भी विवाह के बाद ये पहचान पति के नाम में गुम क्यों हो जाती है। आज कई महिलाएं हैं, जो विवाह के बाद अपने नाम व सरनेम को अपने से कोसौं दूर छोड आती है। दरअसल वे छोडती नहीं, उन्हें छोडना पडता है। पत्नी पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए पति विवाह के बाद पत्नी को अपना सरनेम अपनाने के लिए कहते हैं। पत्नियौं को भी पति की बात सम्माननीय व हितकारी लगती है। इसलिए वे शादी से पहले के अपने सरनेम को त्याग कर पति के नाम या सरनेम के साथ जीने को अपना धर्म मान लेती हैं। इस मामले में महिलाओं के प्रतिरोध को न पनपने देने के लिए पुरूष् इसे एकता और प्रेम का प्रतिक बताते हैं। पुरूष मानते हैं कि पत्नी द्वारा पति का सरनेम प्रयोग करने से पति पत्नी के बीच अपनापन बढता है। सवाल यह उठता है कि विवाह के बाद पुरूष् अपनी पत्नी का सरनेम क्यों नहीं अपना सकते। क्यों पत्नी ही अपना सरनेम बदले।
रू ढिवादी विचार
कु छ लोगौं का मानना है कि अगर लडका जन्मेगा तब ही बाप-दादा का नाम आगे बढेगा। लडकी तो अपने पति के घर जा कर उन की बन जाएगी। आखिरकार वह पराया धन होती है। उससे कु ल थोडे न चलने वाला है। एक नारी के मुख से यह सब सुनना महिलाओं के मन और मस्तिष्क पर पुरूष् प्रधान समाज के हावी होने का सुबूत है।
आसान नहीं बदलना
पहले जमाने में महिलाएं दहलीज से बाहर कदम नहीं रखती थी। पर अब जमाना बदल गया है, वे अब चाँद तक पहुंच गई हैं। उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली है, जिसके चलते विवाह के बाद यदि सरनेम बदलने के लिए कहा जाए तो यह काफी मुश्किल हो जाता है। उद्योग जगत की सफल महिलाओं व फिल्मी दुनिया की हीरोइनों की प्रसिद्धि व पहचान उन के स्वयं के या विवाह के पहले के नाम व सरनेम से होती है । अगर बीच में वे अपना सरनेम बदल ले तो लोगों को उन्हें पहचानने में मुश्किल होगी। कई बार तो सरनेम बदलने का दबाव जाति में अंतर की वजह से बनाया जाता है। वास्तव में जातिवाद सरनेम से ही होता है। इसी तरह भारत में यदि हरेक का सरनेम जाति आधारित न हो, न जाने कितनी ही समस्याएं अपने आप ही सुलझ जाए।

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