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रिप्लाइ मी राइट नॉव

By: Team Aapkisaheli | Posted: 24 July, 2012

रिप्लाइ मी राइट नॉव
एसएमएस और क्विक कम्युनिकेशन के वर्तमान दौर में बढती बेसब्री और तुनकमिजाजी हर रिश्ते को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। ऎसा सिर्फ प्यार-मोहब्बत में ही नहीं, बल्कि बच्चो से लेकर बडों तक के हर मामले में दिख रहा है। फ्रेंड-पार्टनर हों या क्लासमेट, मॉम हो या डैड, ब्रदर हो या सिस्टर, हर किसी से हंा कहलवाने की जिद से रिश्ते भी खतरे में पडते जा रहे हैं। इस बार हमने बेसब्री यानी इंपेशेंस के इसी पारे को नापने की कोशिश की है।
फीलींग ऑफ रिजेक्शन
यूमन नेचर को जानने-समझने वाले साइकियाट्रिस्ट्स का मानना है की आज लोगों के बेसब्री का सबसे बडा कारण उन्हें फीलिंग आफ रिजेक्शन ही लगता है। आज कोइ भी रिश्ता हो, किसी को अपनी इग्नोरेंस बर्दाश्त नहीं हो पाती। चाहे वह लाइफ पार्टनर हों या फ्रेंड या फेसबुक फ्रेंड या फिर फैमिली मेंम्बर्स ही क्यों न हों...। ऎसा नहीं है कि सिर्फ प्यार के मामलों में ही इग्नोरेंस असहनीय होती है। दरसल, अब तो हर कोई अपने लिए हां ही सुनना चाहता है और वह भी बिना देर किए। अगर किसी कारण जवाब आने में देरी होती है तो बेसब्री का पैमाना इस तरह छलकने लगता है कि आपसी रिश्तों की ही तोड-फोड शुरू हो जाती है।
वी वांट इंस्टैटं
दरसल, आज हर कोई इंस्टैटं जवाब चाहता है। इंतजार करना उसे कतई पसंद नहीं। माना जा रहा है कि मोबाइल, एसएमस, ईमेल, सोशल नेटवर्किग साइट्स जैसे टूल्स ने इस बेसब्री को और बढाने का काम किया है।
विलेन कौन?
तो क्या यह माना जाए कि हाल के वर्षो में बच्चो से लेकर बडों तक में अधीरता खतरे की हदें पार कर रही हैक् या फिर आज के कम्यूनिकेशन टूल्स ने हमारा इंपेशेंस को अभिव्यक्त करने का प्लेटफार्म मुहैया करा दिया है।
इंपेशेंस-कल, आज और कल
अधीर यानी इंपेशेंस होना बेसिक ±यूमन नेचर है। पर आसपास के परिवेश से ही हमारा यह नेचर डिसाइड होता है। इस परिवेश में मोबाइल, एप्स, सोशल नेटवकिंüग साइट्स आदि भी शामिल हैं।

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