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सुहागन की पहचान

By: Team Aapkisaheli | Posted: 29 Aug, 2012

सुहागन की पहचान
माथे पर चमकती गोल बिंदी, कलाइयों में खनकती लाल कांच की चूडियाँ हों या मांग में सजा सिन्दूर हो या गले में पहना गया मंगलसूत्र, पांव में इठलाते बिछुए हों या खनकती पायल, जब इन सभी का ध्यान आता है, तो आंखों के आगे एक सुहगिन स्त्री की छवि उभर आती है। क्या आप जानती हैं कि सुहाग के इन चि±चों की आनी एक अलग ही जबां है। सिन्दूर की लाली
शादी के बाद मांग भरना लगभग सभी प्रांतों में जरूरी माना जाता है। पंजाब, हरियाण, बिहार, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में शादी के बाद मांग भ्रना बहुत अहमियत रखता है। उत्तरी व पूर्वी भारत में चटक लाल रंग का सिन्दूर मांग में भरा जाता है और सिन्दूर के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए शक्ति की उपासना की जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार में सिन्दूर का रंग चटक केसरिया होता है, इसे कच्चा सिन्दूर कहते हैं।
मांग टीका या बोरला
मांग सजाने के लिए जहां सिन्दूर का प्रयोग किया जाता है, वहीं राजस्थानी महिलाओं में बोरला या मांग टीकर पहनना भी सुहाग की निशानी माना जाता है। चांदी या सोने का बना मांग टीका सूरज की हानिकारक किरणों से त्वचा का बचाव करता है और अत्यधिक गरमी में अल्ट्रावॉयलेट किरणों को जज्ब कर लेता है। यह एक प्रकार से प्रेशर पॉइंट पर दबाव भी बनाए रखता है, जिससे मस्तिष्क में शांति बनी रहती है। बिंदी माथे पर भौंहों के बीचोंबीच लगी बिंदी तीसरे नेत्र का काम करती है। ऎसा माना जाता है कि एक बार इसका अनुभव होने पर यह तीसरा नेत्र आध्यात्मिकता की ओर जाने को प्रेरित करता है।
मंगलसूत्र की सार्थकता
क्या आप जानती हैं कि विवाह सम्बन्धित कई धार्मिक कृत्य उर्वरता से सम्बन्धित हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश में पहने जानेवाले मंगलसूत्र में एक बॉल के दो हिस्से होते हैं, जो उर्वरता व मातृत्व को सार्थक करते हैं। ये दोनों बॉल्स मंगलसूत्र के गोल काले चेरयू के बीड्स में पिरोए जाते हैं। इसे गले में पहनते हैं, जिससे बुरी नजर से भी बचा जा सके। लक्षणों के स्तर पर देखें, तो यह भारतीय पौराणिक अर्द्धनारीश्वर की संकल्पना से भी मेलखाता है, जिसमें आधा पुरूष व आधी स्त्री मिल कर अर्द्धनारीश्वर बनता है और दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं।
नथ
ज्योतिष के अनुसार लडकी का नाक छिदवाना उसके मामा के लिए शुभ होता है। दक्षिण भारतीय समाज में, जहां कुछ समुदायों में अपने मामा से शादी करने का रिवाज है, इस प्रथा की खासी अहमियत है। भारत के कुछ भागों में कुंआरी लडकी को अंगूडी पहनायीजाती है और शादी के तुरंत बाद उसे नथ पहना दी जाती है।
कांच की चूडियाँ
पूरे भारत में कांच की चूडियों की विशेष अहमियत है। धातु के मुकाबले कांच का हीटिंग पॉइट कहीं ज्यादा होता है। मेटल हीट को बनाए रखता है, जबकि कांच में गरमी रूकती नहीं, इसलिए कांच की चूडियाँ चलन मे आयीं।
करधनी
एक जमाना थ जब करधनी को विवाहित महिलांए बहुत शौक से पहना करती थीं। अगर असली करधनी पर निगाह डालें, तो यह कमरके चारों तरफ बंध कर कमर के निचले हिस्से व पेट की मांसपेशियों को सपोर्ट देती है, क्योंकि महिलाओं को पानी भरते के साथ ही कई भार उठानेवाले काम करने होते है, इसलिए इससे सपोर्ट मिलता है और रीढ की हड्डी सीधी रहती है।
बिछुए
ऎसा माना जाता है कि हिन्दू महिलाओं द्वारा पैरों की दूसरी उंगली में पहने गए बिछुए एक नस पर दबाव देते हैं, जिससे सेक्स की इच्छा कंट्रोल होती है।
शादी की अंगूठी
शादी व सगाई की अंगूठियों को ईसाई दुल्हनेंउल्टे हाथ में रिंग फिंगर में पहनती हैं। माना जाता है कि इस उंगली की किसी एक नस का सीधा सम्बन्ध ह्वदय से होता है और इस उंगली में अंगूठी पहनने से पति हमेशा ह्वदय के करीब रहता है।
मेंहदी व आलता
सोलह श्रंगार में मेहदी व आलते का काफी महत्व है, खासतौर पर शादीशुदा महिलाओं के इसे लगाने के पीछे तो और भी रोमांचक तथ्य मौजूद हैं। मेंहदी व आलता दोनों ठंडक तो पहुंचाते ही हैं, साथ में मेंहदी लगाकर कुछ घंटों के लिए ही सही काम से छुटी तो मिलती है।

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