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गांबिया : महिलाओं के अधिकारों पर बड़ा प्रहार, सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा महिला खतना पर लगा प्रतिबंध हटाने का मामला

By: Team Aapkisaheli | Posted: 11 Jan, 2026

गांबिया : महिलाओं के अधिकारों पर बड़ा प्रहार, सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा महिला खतना पर लगा प्रतिबंध हटाने का मामला
सैयदा आबिदा परवीन। गांबिया 

अफ्रीकी देश गांबिया में महिलाओं के मानवाधिकारों को लेकर एक बड़ी कानूनी लड़ाई छिड़ गई है। देश के धार्मिक नेताओं और सांसदों के समूह ने महिला जननांग विकृति (Female Genital Mutilation - FGM) पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले की सुनवाई इसी महीने फिर से शुरू होने वाली है, जिसे दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बढ़ रहे बैकलैश (विरोध) के रूप में देखा जा रहा है। 

क्या है पूरा विवाद? गांबिया में साल 2015 से ही FGM को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, लंबे समय तक यह कानून कागजों तक सीमित रहा, लेकिन 2023 में पहली बार तीन महिलाओं को इस प्रथा को अंजाम देने के लिए सजा सुनाई गई। इन सजाओं के बाद कट्टरपंथी समूहों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया। साल 2024 में सांसद अल्मामेह गिब्बा ने संसद में इस प्रथा को फिर से वैध बनाने के लिए एक बिल पेश किया था, जिसे संसद ने खारिज कर दिया। अब वही समूह सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दे रहा है कि FGM पर प्रतिबंध उनके सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। 

मासूमों की मौत और खुदा की मर्जी का तर्कः यह कानूनी लड़ाई तब हो रही है जब पिछले साल गांबिया में खतने के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव के कारण दो मासूम बच्चियों की मौत हो गई थी। अदालत में गवाही देते हुए प्रमुख मुस्लिम नेता अब्दुलई फैटी ने दावा किया कि यह इस्लाम का हिस्सा है और हानिकारक नहीं है। जब उनसे बच्चियों की मौत पर सवाल किया गया, तो उन्होंने विवादास्पद बयान देते हुए कहा, हम मुसलमान हैं और अगर कोई मरता है, तो वह खुदा की मर्जी है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस प्रथा का लाभ महिलाओं की यौन इच्छा को कम करना है, जो पुरुषों के लिए समस्या हो सकती है। 

गांबिया में भयावह आंकड़ेः गांबिया दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ FGM की दर सबसे अधिक है। 75 प्रतिशत महिलाएं (15-49 वर्ष) इस दर्दनाक प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं। दो-तिहाई लड़कियों का खतना 5 वर्ष की आयु से पहले ही कर दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन और यातना करार दे चुका है। 

वैश्विक स्तर पर अधिकारों का ह्रासः महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था विमेन इन लिबरेशन एंड लीडरशिप की संस्थापक फातौ बाल्डेह कहती हैं, यह केवल गांबिया का मुद्दा नहीं है। यह महिलाओं के अधिकारों में हो रही वैश्विक गिरावट का हिस्सा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया के कई देशों में महिलाओं के संरक्षण कम हो रहे हैं: अफगानिस्तान में तालिबान महिलाओं के अधिकार छीन रहा है। अमेरिका में गर्भपात और गर्भनिरोधक सेवाओं पर प्रतिबंध बढ़ रहे हैं। सिएरा लियोन ने अदालती आदेश के बावजूद अब तक FGM पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। बोलीविया और उरुग्वे जैसे देशों में भी यौन हिंसा के खिलाफ कानूनों को कमजोर करने के प्रस्ताव पेश किए गए हैं। 

वर्तमान कानून और सजाः गांबिया के मौजूदा कानून के तहत, खतना करने वाले व्यक्ति को 3 साल तक की जेल या भारी जुर्माना हो सकता है। यदि इस प्रक्रिया के कारण लड़की की मृत्यु हो जाती है, तो दोषी को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। अब पूरी दुनिया की नजरें गांबिया के सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। क्या अदालत मानवाधिकारों की रक्षा करेगी या सदियों पुरानी इस दर्दनाक प्रथा को धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर दोबारा बहाल कर देगी?

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