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जाने आशा पारेख की जिन्दगी के खास लम्हों के बारें में...

By: Team Aapkisaheli | Posted: 02 Oct, 2012

जाने आशा पारेख की जिन्दगी के खास लम्हों के बारें में...
बॉलीवुड की लोकप्रिय अभिनेत्री आशा पारेख 2 अक्टूबर को अपनी खूबसूरत जिन्दगी के 70 वर्ष पूरे हो गये। गुजराती परिवार की आशा पारेख का जन्म बेगलुरू में हुआ था। इनके पिता हिन्दू व मां मुस्लिम थीं और परिवार साई बाबा का परमभक्त था। आशा की मां ने इन्हें बचपन मे ही क्लासिकल डांस की शिक्षा दी। सिर्फ 10 साल थी इनकी जब वह फिल्मी दुनिया में आ गई। पहली बाल-फिल्म थी, आसमान जो 1954 में रिलीज हुई। बेबी आशा की एक-दो फिल्में और आई। इसी साल बिमल रॉय ने आशा से प्रभावित होकर एक फिल्म बाप-बेटी बनाई थी। परन्तु फिल्म चली नहीं।
कुछ वर्ष बाद विजय भट्ट ने अपनी फिल्म में आशा को यह कहकर अभिनेत्री की भूमिका नहीं दी कि उसमें एक्टे्रस के गुण नहीं हैं। लेकिन 24 घंटे के भीतर ही आशा की किस्मत बदली। निर्माता सुबोध मुखर्जी व निर्देशक नसीर हुसैन ने आशा को अपनी नई फिल्म दिल देके देखो 1959 के लिए हीरोइन चुन लिया। सिर्फ 17 साल की एज में आशा पारेख फिल्मी हीरोइन बन गई। दिल देके देखो के हीरो थे शम्मी कपूर। फिल्म हिट रही और इसके बाद आशा ने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। बल्कि नसीर की अगली 6 फिल्मों की मुख्य हीरोइन आशा पारेख ही रहीं।
यह फिल्में थीं-: जब प्यार किसी से होता है देवानंद, फिर वही दिल लाया हंू जॉय मुखर्जी, तीसरी मंजिल शम्मी कपूर, बहारों के सपने राजेश खन्ना, प्यार का मौसम शशि कपूर , कारवां जीतेन्द्र। नसीर हुसैन के साथ अफेयर की अफवाह उडी पर जल्द ही ठंडी पड गई। आशा पारेख की जिन्दगी में इफ व बट काफी रहे हैं। हालांकि इन्होंने कडे फैसले भी लिए व परिणाम की खास परवाह नहीं की। दिल देके देखो में पहले वहीदा रहमान का नाम था, अचानक फैसला आशा के पक्ष में गया।
आशा ने स्वयं कश्मीर की कली व ऎन ईवनिंग इन पेरिस में काम करने से इनकार किया और लाभ शर्मिला टैगोर को मिला। इसी तरह शराफत व सीता-गीता ठुकराई और फायदा हेमा मालिनी को हुआ। कटी पतंग की भूमिका के लिए आशा पारेख को फिल्मफेयर की बेस्ट एक्ट्रेस भी चुना गया था। बाद में 2001 में आशा पारेख को फिल्मफेयर का लाइफ एचीवमेंट पुरस्कार भी दिया गया था। सन् 1992 में आशा पारेख को पद्मश्री से नवाजा गया। हीरोइन की भूमिका से रिटायर होकर आशा ने कुछ फिल्मों में सहायक की भाभी, विधवा आदि। अदाकारी की। फिर शीघ्र ही नसीर हुसैन की सलाह पर निर्देशन व फिल्म निर्माण की ओर मुड गई। आशा पारेख ने अपनी प्रोडक्षन कंपनी आकृति स्थापित की। कुछ स्तरीय टीवी सीरियल बनाए। इसमें पलाश के फूल, बाजे पायल, कोरा कागज व कॉमेडी सीरियल दाल में काला उल्लेखनीय हैं।
आशा पारेख ने अपनी डांस अकादमी कारा भवन भी शुरू की। आशा पारेख भारतीय फिल्म सेसर बोर्ड की महिला अध्यक्षा 1998-2001 बनीं। इस दौरान इन्हें कोई सैलरी तो नहीं मिली, परन्तु कुछ आलोचनांए इनके साथ जरूर जुडंी। वजह थी कि सेंसर बोर्ड में इन्होंने कुछ सख्त नीतियां अपनाई। कई फिल्में पास नहीं होने दीं, इसमें शेखर कपूर की फिल्म एलिजाबेथ भी शामिल है। आशा सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्षा भी रहीं। आशा पारेख आजीवन अविवाहित रही हैं।
लेकिन वह अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ अच्छा समय गुजारती हैं। वहीदा रहमा, साधना, नंदा व शम्मी व आशा पारेख की दोस्ती कइ्र दशकों से है। बल्कि आजकल तो उनकी घनिष्टता बढती ही जा रही है चारों नियमित रूप से एक-दूसरे के घर मिलती हैं। बतियाने केसाथ बॉलीवुड कीपुरानी यादें ताजा करती हैं। खाना-पीना व मटर गश्ती भी साथ-साथ करती हैं।

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