एक ही दिन में 10 महिलाओं की मौत : सड़क सुरक्षा और महिलाओं की जान पर खतरा

By: Team Aapkisaheli | Posted: 14 Jan, 2026

एक ही दिन में 10 महिलाओं की मौत : सड़क सुरक्षा और महिलाओं की जान पर खतरा

सैयदा आबिदा परवीन। जयपुर 

आज का दिन महिलाओं के लिए बेहद दुखद साबित हुआ। एक ही दिन में देश के तीन अलग-अलग हिस्सों से आई सड़क हादसों की खबरों ने हमें सड़क सुरक्षा के गंभीर संकट और महिलाओं की जान पर मंडराते खतरे की याद दिला दी। तीन राज्यों में 10 महिलाओं की मौत, यह केवल दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम और सुरक्षा जागरूकता में गंभीर कमी की चेतावनी हैं। 

राजस्थान: जयपुर–बीकानेर राष्ट्रीय राजमार्ग पर परिवार उजड़ा 
सीकर जिले के फतेहपुर थाना क्षेत्र के हरसावा गांव के पास बुधवार शाम करीब चार बजे एक अर्टिगा कार की ट्रक से टक्कर में छह महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी पीड़ित एक ही परिवार के थे, जो लक्ष्मणगढ़ में एक अंतिम संस्कार से लौट रहे थे। टक्कर इतनी भीषण थी कि कार पूरी तरह चकनाचूर हो गई। ग्रामीणों और पुलिस ने मिलकर राहत कार्य किया, लेकिन परिवार का दर्द अब अपूरणीय है। 

महाराष्ट्र: पुणे में दो बहनों की जान गई 
पिंपरी–चिंचवड़ के कालेवाड़ी इलाके में तेज रफ्तार ट्रक की टक्कर से ऋतुजा शिंदे (24) और नेहा शिंदे (20) की मौके पर मौत हो गई। दोनों बहनें बाइक से जा रही थीं। हादसे ने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। यह घटना सड़क सुरक्षा की अनदेखी और लापरवाही का दर्दनाक उदाहरण है। 

उत्तराखंड: पहाड़ों की खाई में फंसी जानें 
पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में राम मंदिर–चाकबोरा मोटर मार्ग पर एक ऑल्टो कार 150 मीटर गहरी खाई में गिर गई। हादसे में हीरा देवी और उमा देवी की मौत हो गई, जबकि चालक गंभीर रूप से घायल हुआ। पुलिस और हाईवे पेट्रोलिंग टीम ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। यह घटना भी दिखाती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क सुरक्षा की कमी कितनी जानलेवा हो सकती है। 

आंकड़े जो हिला देते हैंः 
भारत में सड़क हादसे अब एक राष्ट्रीय संकट बन चुके हैं। हर साल 4.5–5 लाख सड़क हादसे होते हैं, जिनमें 1.7 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। इसमें महिलाओं की संख्या भी चिंताजनक है—हर साल करीब 20–21 हजार महिलाएं सड़क हादसों में अपनी जान गंवाती हैं। 

सवाल जो अनुत्तरित हैंः 

क्या तेज रफ्तार, लापरवाही और कमजोर सड़क सुरक्षा व्यवस्था महिलाओं के लिए और ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है? क्या सड़क सुरक्षा कानून और जागरूकता अभियान पर्याप्त हैं? कब तक महिलाओं की मौतें सिर्फ खबरों की सुर्खियां बनती रहेंगी, जबकि उनके परिवार टूटते रहें? ये हादसे केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों का दर्द हैं जिनकी दुनिया एक पल में उजड़ गई। सवाल यह है कि क्या हम केवल हादसों की रिपोर्ट करेंगे, या महिलाओं की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएंगे?

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