पीएम मोदी की अपील से एक साल में अल्पकालिक आर्थिक झटके से उबर सकता है भारत: विशेषज्ञ
By: Team Aapkisaheli | Posted: 11 May, 2026

बिजनेस डेस्क। नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक साल के आर्थिक समायोजन ढांचे की अपील सही और व्यावहारिक कदम है। यह कदम अल्पकालिक आर्थिक दबाव को संभालने के लिए है, और अगले नौ महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार संभव है। यह बात दुबई स्थित एमिरेट्स इन्वेस्टमेंट बैंक के वेल्थ मैनेजमेंट निदेशक डॉ. धर्मेश भाटिया ने सोमवार को एक इंटरव्यू में कही।
डॉ. भाटिया ने कहा कि इस तरह की अस्थायी आर्थिक चुनौतियां सामान्य आर्थिक चक्र का हिस्सा होती हैं, और अगर नीतियां और आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहें, तो इनका असर बाद में खत्म किया जा सकता है। उन्होंने कहा, तीन महीने का आर्थिक दबाव समय के साथ पूरी तरह से रिकवर किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी की एक साल के आर्थिक समायोजन की अपील पर डॉ. भाटिया ने कहा कि यह समयसीमा उत्पादन और व्यापक आर्थिक चक्र के हिसाब से बिल्कुल सही बैठती है। उन्होंने बताया कि उत्पादन चक्र आमतौर पर सालाना आधार पर आंका जाता है, जहां छोटे समय के झटकों को लंबे समय में संभाल लिया जाता है। उन्होंने आगे कहा कि शुरुआती तीन महीने का आर्थिक दबाव अगले कुछ महीनों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सही कदम उठाने से इसकी भरपाई संभव है।
डॉ. भाटिया ने कहा, पहले तीन महीने तनाव के दौर होते हैं। इसका असर अगले छह से नौ महीनों तक रह सकता है, लेकिन अगर इस दौरान सुधारात्मक कदम उठाए जाएं तो शुरुआती नुकसान की पूरी भरपाई की जा सकती है। गैर-जरूरी सोने की खरीद कम करने और वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने की प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर डॉ. भाटिया ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा करना है।
उन्होंने कहा कि भारत का व्यापार घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात की वजह से बढ़ता है, इसलिए यह सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने बताया, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। यह मूल रूप से आयात कम करने और खपत को नियंत्रित करने की अपील है।
डॉ. भाटिया ने कहा कि सोने का आयात कम किया जा सकता है, लेकिन ऊर्जा पर निर्भरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। उन्होंने कहा, हम सोने के बिना रह सकते हैं, लेकिन तेल के बिना नहीं। तेल की बढ़ती कीमतों का दोहरा असर पड़ता है- आयात बिल बढ़ता है और डॉलर का बहाव भी ज्यादा होता है। उन्होंने कहा कि ऐसे कदमों का मकसद कम समय में खपत के दबाव को नियंत्रित करना है, ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे और मध्यम अवधि में अर्थव्यवस्था और मजबूत होकर उभरे।
-आईएएनएस
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